इतिहास से सत्व को गायब करने की कोशिश की गई- राकेश पुरोहित

Thu 06 Jun 19  8:21 pm


राजसमंद (राव दिलीप सिंह)जिले के आमेट नगर में गुरूवार को वीरवर पत्ता गौरव संस्थान के बैनर तले वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप की ४७९ वी जन्म जयंति हर्षोउल्लास से मनाई गई। प्रातः ८ बजे राजमहल परांगण से वाहन रैली की शुरूआत हुई। जो तकिया रोड़, होलीथान, लक्ष्मीबाजार, बस स्टेण्ड़, रेल्वे स्टेशन, वीरपत्ता सर्कल, शीतल गेस्ट हाउस, पुलिस थाना होते हुए पंचायत समिति परिसर पहुची। जहां महाराणा प्रताप की आदम कद प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया। इसके बाद पंचायत समिति परिसर स्थित महाराणा प्रताप सभागार में शौर्य सभा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में संत सानिध्य महंत हरिदास पशु पतिनाथ मंदिर आड़ावाला कारहा। कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्थान के अध्यक्ष एवं आमेट ठिकानेदार रावत प्रभु प्रकाश सिंह चुण्ड़ावत ने की। मुख्य वक्ता विकास अधिकारी एवं गोकथा वाचक राकेश पुरोहित थे। महंत हरिदास ने कहा कि हमारा इतिहास महापुरूषो के कारण ही विद्यमान है। महाराणा प्रताप विश्व के मुकुट मणी है। महापुरूषो की जयंति नई पीढ़ी को प्रेरणा देती है। मुख्य वक्ता राकेश पुरोहित ने कहा कि त्याग के लिए पन्ना, भगवत प्रेम के लिए मीरा एवं देश प्रेम के लिए महाराणा प्रताप के चरित्र जैसा उज्जवल चरित्र ओर किसी का नही है। सनातन

धर्म एवं मातृभूमि की रक्षा के लिए प्रताप ने राज महल त्यागा था। तात्कालिन समय में मेवाड़ सनातन मल्यों की रक्षा का एक मात्र उम्मीद था। प्रताप का
प्रण सनातन धर्म के बीज को सुरक्षित रखना था। उत्सव अतित को याद करने के लिए नही मनाते। अतित का बखान वो करता जिसका वर्तमान कमजोर होता है। इतिहास पढाने का मतलब अतित की गलतियों को दौरान नही, गौरव को भूलना नही एवं नई पीढ़ी को आदर्श मूल्य
देना है। कुछ लोगो ने इतिहास को तौड़ मरोड़ कर रखा गया। जिससे इतिहास से सत्व गायब हुआ। महाराणा के जीवन चरित्र को भी सही से नही बताया गया।  प्रभु प्रकाश सिंह ने कहा कि महाराणा प्रताप ने युद्ध कौशल वीर पत्ता एवं जग्गा से सीखा था। वीर पत्ता चितौड़ के तीसरे साके में काम आये तक प्रताप की उम्र करीब २८ वर्ष थी। प्रताप ने इस युद्ध में
पत्ता का युद्ध कौशल निकट से देखा। उदयसिंहजीं के राज में ही वागड़ के चौहानों ने विद्रोह किया तब राजकुमार प्रताप के सानिध्य में और जग्गाजी के नेतृत्व में वागड़ क्षेत्र की ओर प्रस्थान किया। सुलम्बर से २१ किलोमीटर आगे जैताणा गांव सोम नदी के किनारे पर फौज का डेरा कायम किया। वागड़ के चौहानों ने रात्रि के समय धोखे से मेवाड़ की फौज पर हमला किया। परंतु जग्गाजी के डेरे की रस्सियां में उलझकर गिरे जिससे जाग हो गयी। जग्गाजी सोते हुए जागे और तलवार लेकर चैहानों से लड़ने लगे। फिर मेवाड़ की फौज विजयी रही जग्गाजी युद्ध करते हुए उसी जगह वीरगति रणखेत रहे। वहीं उनकी चार रानियां सती हुई। और उनकी छतरी बनवाई जो वर्तमान में जीर्णशीर्णहै।  इस दौरान पुष्पेन्द्र सिंह चुण्ड़ावत, जयवर्द्धन सिंह चुण्ड़ावत, दिलीप सिंह, मुकेश सिरोया, सुरेश सोनी, आनन्द सिंह शक्तावत, विक्रम सिंह चुण्ड़ावत, प्रताप सिंह मेहता , शिवराज सिंह शक्तावत, अनोप सिंहचुण्ड़ावत, तेज सिंह चुण्ड़ावत, जीवन सिंह सोलंकी सहित नगरवासी एवं आस पास से बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन चन्द्रभानु सिंह चुण्ड़ावत ने किया।

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