गणगौर पूजा कब है, जानिए महिलाएं क्यों रखती हैं गुप्त उपवास

गणगौर पूजा कब है, जानिए महिलाएं क्यों रखती हैं गुप्त उपवास

  2020-03-26 11:45 pm

हिन्दू समाज में चैत्र शुक्ल तृतीया का दिन गणगौर पूजा के रूप में मनाया जाता है. गणगौर पर्व रंगबिरंगी संस्कृति का अनूठा उत्सव है. यह पर्व विशेष तौर पर केवल महिलाओं के लिए ही होता है. महिलाओं के लिए ये अखंड सौभाग्य की प्राप्ति का पर्व है. महिलाएं इस पर्व को अपने पति की मंगल कामना और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए मनाती हैं. कुंवारी लड़कियां भी इस दिन गणगौर की पूजा करती हैं. ऐसा माना जाता है कि इसकी कृपा से उन्हें मन चाहा वर प्राप्त हो जाता है. यह पर्व मुख्य रूप से राजस्थान में मनाया जाता है. इस बार गणगौर पूजा 27 मार्च शुक्रवार को है. इस बार कोरोना वायरस को लेकर पूरे देश में लॉकडाउन है. कोरोना वायरस के चलते भक्तों को घर पर ही विधि विधान के साथ पूजा करनी होगी. ये पर्व हर साल चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन मनाया जाता है. गणगौर का अर्थ है, ‘गण’ और ‘गौर’. गण का तात्पर्य है शिव और गौर का अर्थ है पार्वती. गणगौर पूजन मां पार्वती और भगवान शिव की पूजा का दिन है.

उत्साह के साथ मनाया जाता है गणगौर पूजा

गणगौर पूजा भारत के प्रमुख त्यौहारों में से एक है और यह बहुत ही श्रद्धा भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है. इस दिन भगवान शिव ने पार्वतीजी को तथा पार्वतीजी ने समस्त स्त्री-समाज को सौभाग्य का वरदान दिया था. इस दिन सुहागिनें दोपहर तक व्रत रखती हैं. महिलाओं नाच-गाकर, पूजा-पाठ कर हर्षोल्लास से यह त्योहार मनाती हैं. महिलाएं चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी को प्रातः स्नान करके गीले वस्त्रों में ही रहकर घर के ही किसी पवित्र स्थान पर लकड़ी की बनी टोकरी में जवारे बोती है. जब तक गौरीजी का विसर्जन नहीं हो जाता (करीब आठ दिन) तब तक प्रतिदिन दोनों समय गौरीजी की विधि-विधान से पूजा कर उन्हें भोग लगातीं है. महिलाएं गौरीजी की इस स्थापना पर सुहाग की वस्तुएं जैसे कांच की चूड़ियां, सिंदूर, महावर, मेहंदी, टीका, बिंदी, कंघी, शीशा, काजल आदि चढ़ाई जाती हैं.गणगौर पूजा का महत्व

गणगौर पूजा भारत के प्रमुख त्यौहारों में से एक है और यह बहुत ही श्रद्धा भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है. होली के दूसरे दिन से शुरू यह पर्व पूरे 16 दिन तक मनाया जाता है. सिर्फ राजस्थान में ही नहीं यूपी, बिहार, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तराखंड और मध्यप्रदेश समेत पूरे भारत में इसके रंग देखने को मिलते हैं. यह पर्व चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की तीज को समाप्त होता है. इस दिन कुंवारी कन्याएं और महिलाएं मिट्टी से गौर बनाकर, उनको सुंदर पोषाक पहनाकर शृंगार करती हैं और खुद भी संवरती हैं. कुंवारी कन्याएं इस व्रत को मनपसंद वर पाने की कामना से करती है, तो वहीं विवाहित महिलाएं इसे पति की दीर्घायु की कामना करती हैं. महिलाएं 16 शृंगार, खनकती चूड़ियां और पायल की आवाज के साथ बंधेज की साड़ी में नजर आती हैं.

इस पूजा में 16 अंक का विशेष महत्व होता है. गणगौर के गीत गाते हुए महिलाएं काजल, रोली, मेहंदी से 16-16 बिंदिया लगाती हैं. गणगौर को चढ़ने वाले प्रसाद, फल व सुहाग की सामग्री 16 के अंक में ही चढ़ाई जाती. गणगौर का उत्सव घेवर और मीठे गुनों के बिना अधूरा माना जाता है. खीर, चूरमा, पूरी, मठरी से गणगौर को पूजा जाता है. आटे और बेसन के घेवर बनाए जाते हैं और गणगौर माता को चढ़ाए जाते हैं. गणगौर पूजन का स्थान किसी एक स्थान या घर में किया जाता है. गणगौर की पूजा में गाए जाने वाले लोकगीत इस अनूठे पर्व की आत्मा होते हैं.

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