बकाया GST का ब्याज बना गले की फांस

Wed 15 May 19  11:05 pm


नई दिल्ली ] जैसे-जैसे सालाना जीएसटी रिटर्न की डेडलाइन करीब आ रही है, वैसे-वैसे टैक्स पेमेंट में देरी पर ब्याज को लेकर ट्रेड-इंडस्ट्री की बेचैनी बढ़ रही है। जीएसटी एक्ट के सेक्शन 50 के तहत ब्याज की गणना डीलर के कुल मंथली आउटपुट टैक्स पर 1.5% की दर से होती आई है, जबकि इंडस्ट्री शुरू से ही मांग करती आई है कि यह आउटपुट टैक्स के बजाय नेट टैक्स पर लगना चाहिए। खुद सरकार भी इसे विसंगति मान चुकी है और संशोधन की बात भी कह चुकी है, लेकिन नोटिफिकेशन के अभाव में टैक्सपेयर छह महीने की देरी पर कम से कम 20 गुना ज्यादा ब्याज चुकाने पर मजबूर हैं। ज्यादातर ट्रेडर आशंकित हैं कि अगर उन्होंने ज्यादा रेट से ब्याज चुका दिया और चुनाव बाद सरकार ने संशोधन कर दिया तो उनकी अतिरिक्त रकम रिफंड नहीं होगी, जैसा कि जीएसटी रिटर्न की लेट फीस के मामले में देखा जा चुका है। अगर किसी डीलर का मंथली आउटपुट टैक्स 1 करोड़ रुपये है और इनपुट टैक्स 95 लाख है, तो उसका नेट टैक्स 5 लाख बनता है। अगर वह छह महीने बाद टैक्स जमा करा रहा है तो सेक्शन 50 के मुताबिक उसे 1 करोड़ के 1.5% मंथली के हिसाब से 9 लाख रुपये ब्याज चुकाना होगा, जबकि नेट टैक्स 5 लाख पर छह महीने का ब्याज 45 हजार ही होगा। 30 जून तक भरे जाने वाले एनुअल रिटर्न से पहले बकाया टैक्स भुगतान हर हाल में किया जाना है। जीएसटी कंसल्टेंट ने बताया कि 22 दिसंबर 2018 को जीएसटी काउंसिल ने सेक्शन 50 को संशोधित करने की घोषणा की थी, लेकिन अभी तक यह नोटिफाई नहीं हो सका है। हाल ही में तेलंगाना हाई कोर्ट के एक फैसले से समस्या और गहरा गई है कि ब्याज आउटपुट टैक्स पर ही देय होगा। जो डीलर आउटपुट टैक्स के हिसाब से अधिक ब्याज चुकाने को तैयार हैं, उन्हें भी उम्मीद है कि चुनाव बाद सरकार काउंसिल के फैसले को नोटिफाई कर सकती है। ऐसे में उनका पैसा रिफंड नहीं होगा। गौरतलब है कि दिसंबर में रिटर्न फीस माफी के ऐलान से पहले तक फीस भर चुके लोगों को रिफंड नहीं मिला है। सीए अमित के मुताबिक, समस्या सिर्फ टैक्स पेमेंट तक सीमित नहीं है। सेक्शन 16(2) के मुताबिक 180 दिन के भीतर सप्लायर को भुगतान नहीं करने पर देय ब्याज को लेकर भी कन्फ्यूजन गहरा गया है। इस ब्याज के माफ होने की चर्चा रही है और डीलर्स को लगता है कि भुगतान के बाद अगर राहत मिली तो यह रकम भी नहीं लौटेगी।
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