बाराबंकी से ईरान गए थे सर्वोच्‍च नेता के दादा 

अयातुल्‍लाह खामेनेई के दादा सैय्यद अहमद मसूवी उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रहने वाले थे। 1830 के दशक में वह अवध के नवाब के साथ धार्मिक यात्रा पर इराक और फिर ईरान गए थे। लेकिन इसके बाद यहां से उनके लौटने का ही मन नहीं किया और वो वहां के खामेनेई गांव में बस गए। डाइचे वेले के मुताबिक उनके बाद की पीढ़ी ने खामेनेई को अपने सरनेम की तरह इस्‍तेमाल किया और आज ये नाम ईरान के सबसे ताकतवर शख्‍स के साथ जुड़ा है। ईरान की क्रांति के सफल होने से पहले तक ईरान के शाह की हुकूमत में खामेनेई को भारतीय मुल्‍ला और एजेंट तक भी कहा जाता था। आपको बता दें कि अयातुल्‍लाह को गजल सुनने का शौक था। एक लेख में इस शौक को केलर अयातुल्‍लाह को काफी बुराभला कहा गया था। लेकिन शाह का ये दांव उलटा साबित हुआ और जनता उनके ही खिलाफ सड़कों पर उतर आई थी। 

 

यू लिखी वर्तमान ईरान की पटकथा 

ईरान की सफल क्रांति की बात चली है तो आपको इस इतिहास में ले चलते हैं। बदलते ईरान की पटकथा पहले और दूसरे विश्‍व युद्ध के दौरान लिखी गई थी जब यहां पर तेल के बड़े भंडार की खोज हुई थी। इस खोज को ब्रिटेन एंग्‍लो-फारसी ऑयल कंपनी ने अंजाम दिया था।  जापान की हार के साथ जब दूसरा विश्‍व युद्ध खत्‍म हुआ तब ईरान में पहलवी राजवंश का राज था वहां के राजा मोहम्मद रजा शाह पहलवी ने 1949 में ईरान में नया संविधान लागू किया था। इसके लागू होने के बाद सात पीएम बने लेकिन इनका कार्यकाल बेहद कम समय के लिए रहा। इनमें अली मंसूर, अली रजमारा, खलील फाहिमी, हुसैन अला, मोहम्‍मद मोसद्दिक और अहमद कवाम का नाम शामिल है। मोसद्दिक ने 1952 में तेल की कंपनियों का राष्‍ट्रीयकरण लिया तो इस फैसले के खिलाफ ब्रिटेन ने मोर्चा खोल दिया था। इसी फैसले की वजह से ब्रिटेन ने अमेरिका के साथ मिलकर उनकी सरकार का तख्‍ता पलट कर दिया था। इसके बाद भी यूं तो देश में पीएम बने लेकिन उनका भी कार्यकाल कुछ माह या साल भर का ही रहा। इसकी वजह से देश में पीएम की अहमियत न के ही बराबर था और सारा कंट्रोल मोहम्मद रजा शाह पहलवी के ही पास था।

 

बगावत की सुगबुगाहट

यही वो वजह थी जिसकी वजह से शाह के खिलाफ आम जनता में बगावत को लेकर सुगबुगाहट तेज हो चली थी। दरअसल, जनता इस बात से भी खफा थी कि शाह लगातार अमेरिकी परस्‍त हो रहे थे और जनता की चुनी सरकारों को लगातार तख्‍ता पलट कर गिराया जा रहा था। जनता को लगने लगा था कि शाह अमेरिका की कठपुतली बन गए हैं। जनता के इसी गुस्‍से का फायदा उस वक्‍त के इस्‍लामिक नेता अयातुल्‍लाह रुहोल्लाह खामेनेई ने भरपूर उठाया। वह यूं भी शाह के मुखर विरोधी थे। शाह ने छह सूत्री कार्यक्रम के तहत 1963 में श्वेत क्रांति का एलान किया। सुधारों को लेकर बनाई गई नीतियां पश्चिम देशों की तर्ज पर आधारित थीं, जिनका बड़े पैमाने पर विरोध हुआ और इसकी अगुआई खामेनेई ने की। इससे नाराज होकर शाह ने 1964 में खामेनेई को देश से निकाल दिया। आदेश के बाद खामेनेई फ्रांस चले गए थे, लेकिन वहां जाने के बाद भी वह अपने समर्थकों को दिशा-निर्देश देते रहे। 

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बाराबंकी से ईरान गए थे सर्वोच्‍च नेता के दादा 

अयातुल्‍लाह खामेनेई के दादा सैय्यद अहमद मसूवी उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रहने वाले थे। 1830 के दशक में वह अवध के नवाब के साथ धार्मिक यात्रा पर इराक और फिर ईरान गए थे। लेकिन इसके बाद यहां से उनके लौटने का ही मन नहीं किया और वो वहां के खामेनेई गांव में बस गए। डाइचे वेले के मुताबिक उनके बाद की पीढ़ी ने खामेनेई को अपने सरनेम की तरह इस्‍तेमाल किया और आज ये नाम ईरान के सबसे ताकतवर शख्‍स के साथ जुड़ा है। ईरान की क्रांति के सफल होने से पहले तक ईरान के शाह की हुकूमत में खामेनेई को भारतीय मुल्‍ला और एजेंट तक भी कहा जाता था। आपको बता दें कि अयातुल्‍लाह को गजल सुनने का शौक था। एक लेख में इस शौक को केलर अयातुल्‍लाह को काफी बुराभला कहा गया था। लेकिन शाह का ये दांव उलटा साबित हुआ और जनता उनके ही खिलाफ सड़कों पर उतर आई थी। 

 

यू लिखी वर्तमान ईरान की पटकथा 

ईरान की सफल क्रांति की बात चली है तो आपको इस इतिहास में ले चलते हैं। बदलते ईरान की पटकथा पहले और दूसरे विश्‍व युद्ध के दौरान लिखी गई थी जब यहां पर तेल के बड़े भंडार की खोज हुई थी। इस खोज को ब्रिटेन एंग्‍लो-फारसी ऑयल कंपनी ने अंजाम दिया था।  जापान की हार के साथ जब दूसरा विश्‍व युद्ध खत्‍म हुआ तब ईरान में पहलवी राजवंश का राज था वहां के राजा मोहम्मद रजा शाह पहलवी ने 1949 में ईरान में नया संविधान लागू किया था। इसके लागू होने के बाद सात पीएम बने लेकिन इनका कार्यकाल बेहद कम समय के लिए रहा। इनमें अली मंसूर, अली रजमारा, खलील फाहिमी, हुसैन अला, मोहम्‍मद मोसद्दिक और अहमद कवाम का नाम शामिल है। मोसद्दिक ने 1952 में तेल की कंपनियों का राष्‍ट्रीयकरण लिया तो इस फैसले के खिलाफ ब्रिटेन ने मोर्चा खोल दिया था। इसी फैसले की वजह से ब्रिटेन ने अमेरिका के साथ मिलकर उनकी सरकार का तख्‍ता पलट कर दिया था। इसके बाद भी यूं तो देश में पीएम बने लेकिन उनका भी कार्यकाल कुछ माह या साल भर का ही रहा। इसकी वजह से देश में पीएम की अहमियत न के ही बराबर था और सारा कंट्रोल मोहम्मद रजा शाह पहलवी के ही पास था।

 

बगावत की सुगबुगाहट

यही वो वजह थी जिसकी वजह से शाह के खिलाफ आम जनता में बगावत को लेकर सुगबुगाहट तेज हो चली थी। दरअसल, जनता इस बात से भी खफा थी कि शाह लगातार अमेरिकी परस्‍त हो रहे थे और जनता की चुनी सरकारों को लगातार तख्‍ता पलट कर गिराया जा रहा था। जनता को लगने लगा था कि शाह अमेरिका की कठपुतली बन गए हैं। जनता के इसी गुस्‍से का फायदा उस वक्‍त के इस्‍लामिक नेता अयातुल्‍लाह रुहोल्लाह खामेनेई ने भरपूर उठाया। वह यूं भी शाह के मुखर विरोधी थे। शाह ने छह सूत्री कार्यक्रम के तहत 1963 में श्वेत क्रांति का एलान किया। सुधारों को लेकर बनाई गई नीतियां पश्चिम देशों की तर्ज पर आधारित थीं, जिनका बड़े पैमाने पर विरोध हुआ और इसकी अगुआई खामेनेई ने की। इससे नाराज होकर शाह ने 1964 में खामेनेई को देश से निकाल दिया। आदेश के बाद खामेनेई फ्रांस चले गए थे, लेकिन वहां जाने के बाद भी वह अपने समर्थकों को दिशा-निर्देश देते रहे। 

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भारतीय मूल के थे ईरान के सर्वोच्‍च नेता खामेनेई, यूपी के बाराबंकी से गए थे उनके दादा

भारतीय मूल के थे ईरान के सर्वोच्‍च नेता खामेनेई, यूपी के बाराबंकी से गए थे उनके दादा

  2020-01-08 03:43 pm


नई दिल्‍ली  । ईरान और अमेरिका के बीच तनाव से अब कोई देश अछूता नहीं रहा है। मेजर जनरल कासिम सुलेमानी की मौत के बाद ईरान में उबाल है। वहीं अमेरिका भी समय के साथ अपनी तैयारियां तेज कर रहा है। मध्‍य पूर्व में अमेरिका की मौजूदगी और यहां के देशों से उसका टकराव कोई नया नहीं है। ईरान ही नहीं इराक, सीरिया, लीबिया समेत अफगानिस्‍तान ने इसको करीब से महसूस किया भी है और वर्तमान में भी कर रहे हैं। वहीं विदेश मामलों के विशेषज्ञ इस बात को लेकर एक राय रखते हैं कि अमेरिका की यहां पर मौजूदगी केवल अपने निजी हितों की पूर्ति के लिए ही है। उसके यह निजी हित तभी पूरे हो सकते हैं जब इन देशों में अमेरिकी परस्‍त हुकूमत (Pro-US Government) काबिज हो। इराक में सद्दाम हुसैन के पतन के बाद अमेरिका की सरपरस्‍ती में उसकी पसंद की सरकार बनी थी, लेकिन अन्‍य जगहों पर ऐसा नहीं हो सका।

वहीं ईरानी कमांडर (Iranian Major-General Qassem Soleimani) की मौत के बाद अब इराक भी अमेरिकी फौज को देश से बाहर निकालना चाहता है। जानकारों की राय में अमेरिका ईरान में भी अपनी ही पंसद की सरकार चाहता है, जो उसके हितों के लिए काम करे। लेकिन, ईरान के सर्वोच्‍च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौजूदगी में यह संभव नहीं है। लेकिन आपको ये भी बता दें कि कभी ईरान में भी अमेरिका की पसंदीदा सरकार हुआ करती थी। आपको जानकर हैरत होगी इस हुकूमत को एक भारतीय मूल के शख्‍स ने ही चुनौती दी थी जो बाद में देश का सर्वोच्‍च नेता भी बना था। इनका नाम था अयातुल्‍लाह रुहोल्लाह खामेनेई (Ayatollah Ali Khamenei)।  

 

बाराबंकी से ईरान गए थे सर्वोच्‍च नेता के दादा 

अयातुल्‍लाह खामेनेई के दादा सैय्यद अहमद मसूवी उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रहने वाले थे। 1830 के दशक में वह अवध के नवाब के साथ धार्मिक यात्रा पर इराक और फिर ईरान गए थे। लेकिन इसके बाद यहां से उनके लौटने का ही मन नहीं किया और वो वहां के खामेनेई गांव में बस गए। डाइचे वेले के मुताबिक उनके बाद की पीढ़ी ने खामेनेई को अपने सरनेम की तरह इस्‍तेमाल किया और आज ये नाम ईरान के सबसे ताकतवर शख्‍स के साथ जुड़ा है। ईरान की क्रांति के सफल होने से पहले तक ईरान के शाह की हुकूमत में खामेनेई को भारतीय मुल्‍ला और एजेंट तक भी कहा जाता था। आपको बता दें कि अयातुल्‍लाह को गजल सुनने का शौक था। एक लेख में इस शौक को केलर अयातुल्‍लाह को काफी बुराभला कहा गया था। लेकिन शाह का ये दांव उलटा साबित हुआ और जनता उनके ही खिलाफ सड़कों पर उतर आई थी। 

 

यू लिखी वर्तमान ईरान की पटकथा 

ईरान की सफल क्रांति की बात चली है तो आपको इस इतिहास में ले चलते हैं। बदलते ईरान की पटकथा पहले और दूसरे विश्‍व युद्ध के दौरान लिखी गई थी जब यहां पर तेल के बड़े भंडार की खोज हुई थी। इस खोज को ब्रिटेन एंग्‍लो-फारसी ऑयल कंपनी ने अंजाम दिया था।  जापान की हार के साथ जब दूसरा विश्‍व युद्ध खत्‍म हुआ तब ईरान में पहलवी राजवंश का राज था वहां के राजा मोहम्मद रजा शाह पहलवी ने 1949 में ईरान में नया संविधान लागू किया था। इसके लागू होने के बाद सात पीएम बने लेकिन इनका कार्यकाल बेहद कम समय के लिए रहा। इनमें अली मंसूर, अली रजमारा, खलील फाहिमी, हुसैन अला, मोहम्‍मद मोसद्दिक और अहमद कवाम का नाम शामिल है। मोसद्दिक ने 1952 में तेल की कंपनियों का राष्‍ट्रीयकरण लिया तो इस फैसले के खिलाफ ब्रिटेन ने मोर्चा खोल दिया था। इसी फैसले की वजह से ब्रिटेन ने अमेरिका के साथ मिलकर उनकी सरकार का तख्‍ता पलट कर दिया था। इसके बाद भी यूं तो देश में पीएम बने लेकिन उनका भी कार्यकाल कुछ माह या साल भर का ही रहा। इसकी वजह से देश में पीएम की अहमियत न के ही बराबर था और सारा कंट्रोल मोहम्मद रजा शाह पहलवी के ही पास था।

 

बगावत की सुगबुगाहट

यही वो वजह थी जिसकी वजह से शाह के खिलाफ आम जनता में बगावत को लेकर सुगबुगाहट तेज हो चली थी। दरअसल, जनता इस बात से भी खफा थी कि शाह लगातार अमेरिकी परस्‍त हो रहे थे और जनता की चुनी सरकारों को लगातार तख्‍ता पलट कर गिराया जा रहा था। जनता को लगने लगा था कि शाह अमेरिका की कठपुतली बन गए हैं। जनता के इसी गुस्‍से का फायदा उस वक्‍त के इस्‍लामिक नेता अयातुल्‍लाह रुहोल्लाह खामेनेई ने भरपूर उठाया। वह यूं भी शाह के मुखर विरोधी थे। शाह ने छह सूत्री कार्यक्रम के तहत 1963 में श्वेत क्रांति का एलान किया। सुधारों को लेकर बनाई गई नीतियां पश्चिम देशों की तर्ज पर आधारित थीं, जिनका बड़े पैमाने पर विरोध हुआ और इसकी अगुआई खामेनेई ने की। इससे नाराज होकर शाह ने 1964 में खामेनेई को देश से निकाल दिया। आदेश के बाद खामेनेई फ्रांस चले गए थे, लेकिन वहां जाने के बाद भी वह अपने समर्थकों को दिशा-निर्देश देते रहे। 

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