बुटाटी धाम मंदिर का संचालन यहां ट्रस्‍ट और मंदिर समित‍ि करती है। समिति के अध्‍यक्ष शिवसिंह का कहना है कि हम प्रचार में विश्‍वास नहीं रखते इसलिए आज तक मंदिर के बारे में हमने किसी ने कुछ नहीं कहा। सारे लोग केवल आस्‍था के चलते यहां आते हैं। पिछले दस वर्षों में यहां आने वाले मरीजों की संख्‍या बढ़ी है। इंटरनेट पर मंदिर का खूब नाम है इसलिए देश ही नहीं, विदेशों से भी लोग आते हैं। नवरात्र में अमेरिका, आस्‍ट्रेलिया और अफगानिस्‍तान से भी मरीज यहां आए थे।

यह है धार्मिक कहानी

मंदिर के संबंध में कहानी प्रचलित है। लगभग 600 साल पहले यहां चतुरदास जी नाम के संत थे। कहा जाता है कि उनके पास 500 से अधिक बीघा जमीन थी जो उन्‍होंने दान कर दी और आरोग्‍य की तपस्‍या करने चले गए। बताया जाता है कि सिद्धि प्राप्‍त करके वे आए यहां जीवित समाधि ले ली। उस स्‍थल पर ही आज मंदिर है।

 

खास बातों पर एक नजर

- मरीजों को मंदिर की ओर से भोजन व आवास की नि:शुल्‍क व्यवस्था की जाती है।

- पूरे परिसर में लोग सात दिन तक रुक सकते हैं। उनसे रहने-खाने का शुल्‍क नहीं लिया जाता।

- करीब 90 प्रतिशत लोग अपने ठिकाने पर ही गैस या चूल्‍हे पर भोजन, चाय तैयार करते हैं।

- प्रतिदिन सुबह साढ़े पांच बजे और शाम को साढ़े छह बजे आरती होती है, जिसमें मरीजों-परिजनों का आना अनिवार्य है।

- परिसर में चारों तरफ बड़ी संख्‍या में व्‍हील चेयर इधर-उधर पड़ी नजर आती हैं। इनकी संख्‍या करीब 300 है।

- एकादशी के दिन यहां सर्वाधिक भीड़ उमड़ती है। इस दिन की गई आरती का विशेष महत्‍व बताया गया है।

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लकवे के मरीजों के लिए राहत बनकर उभरा है   बुटाटी धाम मंदिर

लकवे के मरीजों के लिए राहत बनकर उभरा है बुटाटी धाम मंदिर

Sun 20 Oct 19  3:57 pm


उम्‍मीद पर दुनिया कायम है। हालातों से हारे इंसान को यह कहावत बार-बार याद आती है और इसके बूते वह दुश्‍वारियों का ज़हर पीने का माद्दा रखता है। जिंदगी का यही फलसफा राजस्‍थान के नागौर जिले में जीवंत अर्थ पाता दिखाई देता है। यहां बुटाटी धाम नाम का मंदिर है जो अपनी विशेष मान्‍यता के चलते देश भर में मशहूर हो रहा है। मान्‍यता है कि इस मंदिर में सात दिन तक आरती-परिक्रमा करने से पैरालिसिस (लकवा) के मरीजों का यह मर्ज दूर हो जाता है। चूंकि यह जनआस्‍था है इसलिए इसका प्रचार भी देशज है लेकिन है व्‍यापक और प्रभावी। यही वजह है यहां देश भर के अलावा विदेशों से भी लकवे के मरीजों को परिजन केवल माउथ पब्लिसिटी के दम पर ले आते हैं। कई लोगों का दावा है कि सात दिन बाद लकवे का असर या तो पूरी तरह खत्‍म हो गया या बहुत हद तक सुधार हुआ।

कहां स्थित है, कैसे जाएं

बुटाटी धाम मंदिर राजस्‍थान के नागौर जिले की देगाना तहसील में स्थित है। यहां से निकटतम रेलवे स्‍टेशन मेढ़ता रोड़ है जो करीब 45 किमी दूर है। जयपुर एवं जोधपुर रूट पर यह स्‍टेशन आता है। स्‍टेशन से मंदिर आने के लिए जीप मिलती है। अधिकांश लोग स्‍वयं की फोर-व्‍हीलर से भी आते हैं। ठहरने के लिए मंदिर परिसर से आधा किमी दूर गेस्‍ट हाउस है। अजमेर-कोटा रोड पर भी गेस्‍ट हाउस बना है लेकिन अधिकांश लोग मंदिर परिसर में ही ठहरते हैं। ऑटो सेवा है लेकिन बहुत सीमित।

सात दिन का नियम, क्‍या और क्‍यों

यहां मरीजों को अधिक से अधिक 7 दिन और 7 रात ही रुकने की अनुमति है। इससे अधिक समय होने पर उन्‍हें यहां से जाने के लिए बोल दिया जाता है। इसकी क्‍या वजह है। पूछे जाने पर मंदिर प्रबंध समिति अध्‍यक्ष शिवसिंह बताते हैं, नए लोगों को आने के लिए जगह मिलना चाहिये। कोई भी मरीज नया आता है तो सबसे पहले उसका रजिस्‍ट्रेशन किया जाता है। उसके अनुसार उसे सामग्री भी उपलब्‍ध कराई जाती है। इसमें दर्ज तारीख के अनुसार सातवें दिन उसे स्‍थान खाली करना होता है। यदि वह नहीं करता तो उसे यहां से जाने का आग्रह किया जाता है।

अमेरिका, आस्‍ट्रेलिया, अफगानिस्‍तान से आए मरीज

बुटाटी धाम मंदिर का संचालन यहां ट्रस्‍ट और मंदिर समित‍ि करती है। समिति के अध्‍यक्ष शिवसिंह का कहना है कि हम प्रचार में विश्‍वास नहीं रखते इसलिए आज तक मंदिर के बारे में हमने किसी ने कुछ नहीं कहा। सारे लोग केवल आस्‍था के चलते यहां आते हैं। पिछले दस वर्षों में यहां आने वाले मरीजों की संख्‍या बढ़ी है। इंटरनेट पर मंदिर का खूब नाम है इसलिए देश ही नहीं, विदेशों से भी लोग आते हैं। नवरात्र में अमेरिका, आस्‍ट्रेलिया और अफगानिस्‍तान से भी मरीज यहां आए थे।

यह है धार्मिक कहानी

मंदिर के संबंध में कहानी प्रचलित है। लगभग 600 साल पहले यहां चतुरदास जी नाम के संत थे। कहा जाता है कि उनके पास 500 से अधिक बीघा जमीन थी जो उन्‍होंने दान कर दी और आरोग्‍य की तपस्‍या करने चले गए। बताया जाता है कि सिद्धि प्राप्‍त करके वे आए यहां जीवित समाधि ले ली। उस स्‍थल पर ही आज मंदिर है।

 

खास बातों पर एक नजर

- मरीजों को मंदिर की ओर से भोजन व आवास की नि:शुल्‍क व्यवस्था की जाती है।

- पूरे परिसर में लोग सात दिन तक रुक सकते हैं। उनसे रहने-खाने का शुल्‍क नहीं लिया जाता।

- करीब 90 प्रतिशत लोग अपने ठिकाने पर ही गैस या चूल्‍हे पर भोजन, चाय तैयार करते हैं।

- प्रतिदिन सुबह साढ़े पांच बजे और शाम को साढ़े छह बजे आरती होती है, जिसमें मरीजों-परिजनों का आना अनिवार्य है।

- परिसर में चारों तरफ बड़ी संख्‍या में व्‍हील चेयर इधर-उधर पड़ी नजर आती हैं। इनकी संख्‍या करीब 300 है।

- एकादशी के दिन यहां सर्वाधिक भीड़ उमड़ती है। इस दिन की गई आरती का विशेष महत्‍व बताया गया है।

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