स्लिप डिस्क से परेशान हैं तो घबराइए नहीं, इस तकनीक से संभव है उपचार

स्लिप डिस्क से परेशान हैं तो घबराइए नहीं, इस तकनीक से संभव है उपचार

Wed 21 Aug 19  7:28 pm


स्लिप डिस्क को समझने के लिए रीढ़ के बनावट के बारे में जानना जरूरी है। अभी तक यह माना जाता था कि रीढ़ की ही में आई किसी भी खराबी का कोई इलाज नहीं है लेकिन अब ऐसा नहीं है। स्लिप डिस्क बहुत आम बीमारी है जो खराब जीवनशैली के कारण होती है। अब इसका इलाज संभव है। आइए समझते हैं कैसे।

हमारी रीढ़ की ही प्रायः 33 हियों के जोड़ से बनती है और प्रत्येक दो हियां आगे की तरफ एक डिस्क के द्वारा और

पीछे की तरफ दो जोड़ों के द्वारा जुड़ी रहती है। यह डिस्क प्रायः रबड़ की तरह होती है जो इन हियों को जोडने के साथ-साथ उनको लचीलापन प्रदान करती है। तो इन्हीं डिस्क में उत्पन्न हुए विकारों को कहते हैं स्लिप डिस्क।

 

स्पाइनल कैनल सबसे संकरी होती है तब माइक्रोएंडोस्कोरपिक डिकम्प्रेशन तकनीक का प्रयोग होता है।

स्पाइनल कैनाल चौड़ी होत

इस इलाज से बैठने और आगे की ओर झुकने में स्पाइनल कैनाल चौड़ी हो जाती है। यह स्थिति न्यूरोजेनिक क्लारउडिकेशन कहलाती है। गंभीर मामलों में, तंत्रिका तंत्र संबंधी गड़बड़ियां हो जाती हैं, इनमें संवेदनशीलता

बदल जाना, कमजोरी, चलते समय संतुलन नहीं बना पाना और इसके साथ ही यूरिनरी और बॉउल की असंगतता जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

 

इस स्थिति का उपचार डिकंप्रेशन कहलाता है। इसमें कैनल को खोला जाता है और तंत्रिकाओं को स्वतंत्र निर्बाध किया जाता है। इस स्थिति के लिये सामान्यत ओपन सर्जरियां और माइक्रोलम्बर डिकंप्रेशन सर्जरियां की जाती हैं। ओपन सर्जरी जो लैमिनेक्टोओमी के नाम से प्रसिद्ध है इसमें लंबे-लंबे कट लगाये जाते हैं, अनावश्यक रूप से सहारा देने वाली हियों को निकाला जाता है। इस सर्जरी के निशान छूट जाते हैं और चिपकने से 'पोस्ट-लैमिनेक्टोहमी मेम्ब्रेन' के निर्माण के कारण, अस्पताल में रहने का समय बढ़ जाता है और कईं मामलों में पीठ की सर्जरी के असफल होने के कारण शरीर का संतुलन गड़बड़ा जाता है। यही वजह है कि स्पाइन को स्थिर करने के लिये दूसरी सर्जरी की आवश्यकता होती है।

माइक्रोएंडोस्कोपिक डिकंप

हम इस स्थिति का उपचार 'माइक्रोएंडोस्कोरपिक डिकंप्रेशन' तकनीक के द्वारा कर रहे हैं जिसमें विशेष रूप से निर्मित ट्‌ब्यूलर रिट्रैक्टकर का उपयोग डिकम्प्रेशन के लिए किया जाता है। इस ट्‌यूब का व्यास 18 मिली मीटर होता है और यह एक की-होल सर्जरी है। इसमें दायीं और बायीं दोनों नर्व रूट के साथ ही पूरे ड्‌युरॉल सैक का डिकंप्रेशन एकमात्र की-होल के द्वारा किया जाता है जिसमें मुलायम ऊतकों और बोनी कोलैटरल को कोई क्षति नहीं पहुंचती है। इसके कईं लाभ हैं। सर्जरी मे पडने वाला निशान मुश्किल से 1.5-2 से.मी. का होता है और एक सामान्य खरोंच

के समान दिखाई देता है एक लंबे भद्दे निशान के रूप में नहीं जो लैमिनेक्टोमी के बाद दिखाई देता है। इसमें

मांसपेशियों और हियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है। इसलिए यह सर्जरी काफी सुरक्षित है।

दर्द निवारक कम से कम

 

सर्जरी के बाद भी मरीज को घावों में कोई दर्द नहीं होता है। सर्जरी में ऊतकों को इतना कम नुकसान पहुंचता है कि रोगी के मेटाबॉलिक कार्यों पर कोई दबाव नहीं पड़ता है। अधिकतर मरीज उम्रदराज होते हैं जो अक्सर डायबिटीज, उधर रक्तचाप, हृदय रोगों आदि जैसी समस्याओं से भी पीड़ित होते हैं।

मोटे लोगों में घाव भरने में समस्याएं आती है क्योंकि उनकी स्पाइन बहुत गहरी होती है। 6-7 इंच की गहराई में पहुंचने के लिए लंबा काटना पड़ता है। इन रोगियों में, पूरी प्रक्रिया एक की-होल के जरिए पूरी की जाती है। इस स्थिति वाले बहुत सारे मरीज मोटे होते हैं क्योंकि क्लीउडीकेशन पेन के कारण ये चल नहीं पाते हैं और इस कारण वे मोटापे के शिकार हो जाते हैं। सर्जरी के कुछ घंटो बाद ही रोगी चल-फिर सकता है और अगले ही दिन घर जा सकता है। ड्रेसिंग भी वॉटर प्रूफ की जाती है ताकि रोगी के लिए जल्दी से जल्दी नहाना संभव हो सके।

 

- डॉ. अमिताभ गुप्ता, हेड न्यूरो सर्जरी, बत्रा अस्पताल, नई दिल्ली

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