स्वभाव में आना धर्म-जितेश मुनि

Wed 20 Feb 19  4:02 pm

चित्तौड़गढ़ (हलचल) । शांत-क्रांति संघ के प्रज्ञारत्न जितेश मुनि. ने बुधवार को अरिहन्त भवन में आयोजित धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि स्वभाव में आना धर्म है और स्वभाव में टिकना ध्यान। मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, यह जानकारी अनेक लोगों को नहीं है। इस सम्यक् जानकारी के अभाव में हम भटक रहे हैं। भगवान महावीर स्वामी ने साढ़े बारह वर्ष तक घोर तपस्या की और ध्यान में संलग्न रहे। इस अवधि में उन्होनें कोई प्रवचन नहीं दिया और मामूली समय खाने व सोने में लगाकर बाकी सम्पूर्ण समय ध्यान में रहे। जैन दर्शन में ध्यान का सर्वाधिक महत्व है और आचार्य हरिभद्रसूरी जी आदि अनेक आचार्यों ने ध्यान पर विशेष जोर दिया है। किन्तु जैन दर्शन ध्यान के बारे में मार्केटिंग नहीं कर पाया और अन्य दर्शनों ने ध्यान पर मार्केटिंग कर अपना लेबल लगा दिया। 

मुनि‍ ने कहा कि हम संसार पक्ष में बच्चों को ध्यान से पढ़ने, ड्राईवर को ध्यान से गाड़ी चलाने सहित हर क्रिया पर ध्यान रखने का जोर देते हैं पर धर्म करते समय ध्यान को भूल जाते हैं। हमारा दुर्भाग्य है कि हमने ध्यान को छोड़ दिया। बिना ध्यान के धर्म दीर्घकाल तक नहीं टिकेगा। धर्म ध्यान का सीधा व सरल तात्पर्य स्वभाव में आना और स्वभाव में स्थिर होना है।

इससे पूर्व मुकेश मुनि ने अपने उद्बोधन में कहा कि जीवन के लिये जिस प्रकार श्वास की अनिवार्यता है, उसी प्रकार बिना सत्संग के जीवन का कोई महत्व नहीं है। पुण्य और पुरूषार्थ पर विवेचन करते हुए आपने कहा कि नल की टोंटी को खोलना पुरूषार्थ है और टंकी में पानी होना पुण्य है। यदि पुण्यार्जन द्वारा टंकी में पानी नहीं भरा गया तो टोंटी खोलने का पुरूषार्थ करने पर भी पानी मिलना कठिन है। पुण्य का सहयोग नहीं है तो पुरूषार्थ का फल भी नहीं मिलेगा। हम दान, शील, तप व भावना के द्वारा पुण्य की अभिवृद्धि कर सकते हैं। कार्यक्रम का संचालन मंत्री विमलकुमार कोठारी ने किया।