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आतिशबाजी जश्न, फुस्स पाबंदियां

आतिशबाजी जश्न, फुस्स पाबंदियां

 

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कुछ अन्य राज्यों के साथ ही दिल्ली में एक बार फिर दिवाली से पहले पटाखों पर रोक लगा दी गई है। वैसे किसी-न-किसी रूप में ऐसी रोक हर साल दिवाली से पहले लगाई जाती है, और हर बार दिवाली पर दिल्ली का आसमान रह-रहकर झिलमिलाती रोशनी के साथ तेज धमाकों से गूंजता रहता है, और रोक फुस्स हो जाती है। दिवाली ही क्यों, ये धमाके उसके काफी पहले से ही गूंजने लगते हैं और छठ के काफी बाद तक जारी रहते हैं। 
इस बार 4 नवंबर को जब पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका था, तब भी सभी दिशाओं से पटाखों की आवाज गूंज रही थी। उस दिन करवा चौथ था, गहरे धुएं और धुंध के बीच चांद के दर्शन करने के लिए महिलाओं को चंद्रोदय का वक्त गुजर जाने के बाद भी घंटों इंतजार करना पड़ा। इस अवसर पर फूट रहे पटाखे उनकी समस्या को बढ़ाने का ही काम कर रहे थे। वहीं घरों की छतों और पार्कों वगैरह में अपनी-अपनी पत्नी का साथ देने पहंुचे बेचैनी से टहलते कुछ पति पूछ रहे थे कि क्या करवा चौथ पटाखों का त्योहार है?
यही सवाल अक्सर कुछ लोग दिवाली के बारे में भी पूछते हैं और छठ के बारे में भी। कुछ लोग तमाम परंपराओं का हवाला देकर यह बताने की कोशिश भी करते हैं कि दीपावली का आतिशबाजी से कोई नाता नहीं है। ये बातें सही भी हो सकती हैं, लेकिन सच यही है कि लोग किसी परंपरा के चलते आतिशबाजी नहीं करते, बल्कि उसी लिए करते हैं, जिस लिए इसका इस्तेमाल दुनिया भर में होता है। पूरी दुनिया में आतिशबाजी का इस्तेमाल अपनी खुशियों में चार चांद लगाने के लिए किया जाता है। पटाखे, फुलझड़ियां, रॉकेट, अनार वगैरह के बारे में हमारी मान्यता यह है कि इनके बिना खुशियों में रौनक नहीं आती। दिवाली ही क्यों, बहुत से लोग पटाखों को शादियों या बारातों का एक जरूरी हिस्सा मानते हैं। फिर 31 दिसंबर को रात 12 बजे होने वाली आतिशबाजी के लिए आप क्या कहेंगे? एक और उदाहरण देखने के लिए आपको ज्यादा दूर नहीं जाना होगा। कल जब बिहार विधानसभा के चुनाव नतीजे आएंगे, तो जीतने वाले अनेक नेता अपना जश्न आतिशबाजी करके ही मनाएंगे। यह भी हो सकता है कि दिल्ली में कुछ पार्टियों के दफ्तरों के बाहर भी आतिशबाजी की जाए। इसमें वे राजनीतिक पार्टियां भी हो सकती हैं, जिनकी सरकारें दीपावली पर आतिशबाजी पर पाबंदी लगा रही हैं। 
आतिशबाजी या उसके कारोबार पर कागजी रोक लगाना सरकारों के लिए बहुत आसान काम होता है, लेकिन जश्न मनाने की लोगों की इस मानसिकता को बदलना एक कठिन काम है, जिसकी कोशिश कोई नहीं करता। इस रोक को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए समाज को प्रेरित करने की पहल जरूरी है। मध्यवर्ग के विस्तार और उसकी संपन्नता बढ़ने के साथ ही इस पटाखा मानसिकता की जड़ें भी गहरी हुई हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की कुछ कॉलोनियों में तो दिवाली तब तक अधूरी मानी जाती है, जब तक वहां पचास हजार पटाखों की लड़ी न जल जाए। 
दिल्ली के स्कूलों में कुछ साल पहले एक अभियान चलाकर बच्चों को यह बताया गया था कि पटाखों के उत्पादन में बाल श्रमिकों का इस्तेमाल होता है, इसलिए उन्हें पटाखों का बहिष्कार करना चाहिए। बच्चों को इसकी शपथ भी दिलाई गई। दिवाली से दो दिन पहले तक बच्चे पटाखों से दूर रहने की जिद करते भी दिखे। लेकिन बारूद का रसायनशास्त्र आसमान में जो चमक पैदा करता है, उसके सामने ऐसी शपथ ज्यादा टिकी नहीं और जल्द ही वे बच्चे भी पटाखे खरीदने की जिद करते दिखाई दिए। शपथ के बावजूद ये बच्चे पटाखों की ओर क्यों लौट गए? इसका एक कारण तो यह है कि आतिशबाजी का अपना एक सम्मोहन होता है, लेकिन दूसरा बड़ा कारण यह है कि हमने बच्चों से पटाखों के बहिष्कार के लिए तो कहा, लेकिन उन्हें जश्न मनाने का कोई वैकल्पिक तरीका नहीं दे सके। बहिष्कार की अपील और पटाखों पर पाबंदी, दोनों के ही पीछे आग्रह यही होता है कि लोग अपना त्योहार सादगी से मनाएं। लेकिन लोगों को यह बात हजम नहीं होती कि अगर होली-दिवाली को भी सादगी से ही मनाना है, तो इन्हें मनाने की जरूरत क्या है। यही वजह है कि पाबंदी के बावजूद हर साल पटाखे किसी-न-किसी तरह लोगों तक पहंुच जाते हैं, और दिवाली का आसमान पूरी रात पाबंदी को मुंह चिढ़ाता रहता है। 
इसका एक कारण यह भी है कि इस पाबंदी को भी सरकारें किसी सालाना त्योहार की तरह ही मनाती हैं। वे तब जागती हैं, जब दिवाली सिर पर होती है और प्रदूषण उच्चतम स्तर पर जाने की तैयारी कर रहा होता है। तब तक व्यापारियों ने पटाखों का पूरा स्टाक जमा कर लिया होता है और इतने साल में वे उसे पाबंदी के बाद भी खपाना सीख चुके हैं। साल में एक बार कुंभकर्णी नींद टूटने से न पटाखे कम होते हैं और न प्रदूषण। यह चिंता उस समय क्यों नहीं होती, जब दिवाली छह महीने दूर होती है? 
इक्कीसवीं सदी की सरकारों से यह उम्मीद तो की ही जानी चाहिए कि वे सिर्फ प्रदूषण को नहीं, बल्कि ग्लोबल वार्मिंग को रोकने में भी सक्रिय हिस्सेदारी निभाएंगी। इसके लिए जो काम होने हैं, उनमें एक आतिशबाजी का पूरा उन्मूलन भी है, क्योंकि यह कार्बन उत्सर्जन में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। यह काम टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं हो सकता, अंत में हमें पटाखों के उत्पादन पर पूरी रोक लगानी होगी, तो यह काम अभी से क्यों न शुरू किया जाए। आर्थिक -सामाजिक रूप से यह एक बड़ी और व्यापक चुनौती है, क्योंकि इस कारोबार में लगे लाखों लोगों के लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था भी करनी होगी। एक बार अगर हम यह काम कर सके, तो हम लोगों को जश्न मनाने के नए तरीके खोजने की मजबूरियां भी दे देंगे। वैसे ही, जैसे लॉकडाउन ने मजबूरी दी, तो ‘वर्क फ्रॉम होम’ का नया सिलसिला शुरू हुआ।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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