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रिजल्ट ने मीडिया को दिखाया आइना, कब तक छुपा पाएंगे मुंह

रिजल्ट ने मीडिया को दिखाया आइना, कब तक छुपा पाएंगे मुंह

 

दिवाली से पहले ही कमल खिल गया और भाजपा संग एनडीए की खुशियों को पंख लग गए है। आखिर बिहार पर फिर भगवा रंग छा गया। कोई इसे मोदी मैजिक तो कोई डबल इंजन का कमाल बता रहा है। जीत के शोर में जो बात मीडिया से चर्चा में गायब हो रही वो है उसकी विश्वसनीयता का मुद्दा। मतगणना से एक दिन पहले तक एक्जिट पोल के नाम पर एनडीए की हार तकरीबन तय कर देने वाले न्यूज चैनल और अखबार अब उस पर बात ही नहीं करना चाहते। *दूसरों की जिम्मेदारियां तय करने का ‘ठेका’ लेने वाले मीडिया के धुरंधरों को ये तो बताना ही चाहिए कि उन सभी के एक्जिट पोल रियल रिजल्ट से अलग क्यों रहे।* ऐसे में कोई चैनल या अखबार शायद ही इसे अपने सर्वे प्रणाली की विफलता माने पर ये सत्य है कि इस तरह के *परिणाम इन एक्जिट पोल की विश्वसनीयता पर तीखे सवाल खड़े कर रहे है।* चैनलों पर चल रही बहस के दौरान भाजपा नेता ये तंज कसने से चूके भी नहीं है कि आपने तो हमे हरा ही दिया था लेकिन मतदाताओं ने जीता दिया। इस तंज को हल्का-फुल्का मान अनदेखी की तो फिर हकीकत से अलग एक्जिट पोल आकर उनकी विश्वसनीयता को खत्म करेंगे। एक दिन पहले तक एक भी प्रमुख सर्वे में एनडीए को सत्ता नहीं दी गई थी तो *आखिर कोई भी जनता के मन को क्यों नहीं भांप पाया* । चिराग से नीतिश को खतरा तो हर कोई जान रहा था लेकिन एक भी एक्जिट पोल ये नहीं बता पाया कि आरजेडी अच्छा प्रदर्शन करेगी लेकिन कांग्रेस उसकी हार का कारण बन जाएगी। ये कोई पहला मौका नहीं है जब एक्जिट पोल इस तरह वास्तविक परिणामों से विपरीत रहे हो। राजस्थान में वर्ष 2013 के चुनाव में जब कांग्रेस 25 से भी नीचे सिमट गई उस समय एक भी एक्जिट पोल ने उसे 70-80 से कम सीट नहीं दी थी। उत्तरप्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में एक भी एक्जिट पोल ये दावा नही ंकर पाया था कि योगी आदित्यनाथ 400 में से 300 से अधिक सीटे जीत रिकॉर्ड बना रहे है। *सोशल मीडिया ने जब हर मतदाता को जागरूक कर दिया है* उस समय ये तो मानना ही पड़ेगा कि कुछ हजार लोगों से बात करके करोड़ो मतदाताओं के मतदान परिणाम का निष्कर्ष निकालना बहुत कठिन है। कुछ लोग एक्जिट पोल के लिए सर्वे के नाम पर खानापूर्ति होने या किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के आधार पर परिणाम तय कर देने का आरोप भी लगाते है। इन आरोपों का जवाब लेखों से नहीं बल्कि मीडिया अपने एक्जिट पोल की विश्वसनीयता कायम करके ही दे सकता है। *फिलहाल तो मीडिया के चुनाव सर्वो और दावों की साख बुरी तरह गिरी है* । निष्पक्ष आकलन के लिए पहचाने जाने वाले चैनल और सर्वे एजेसिंया भी दावे के विपरीत परिणाम के मुद्दे पर बहस से बचना चाहती। हमारी साख व प्रतिष्ठा बनी रहे इसके लिए आत्मचिंतन तो करना होगा ताकि कोई मीडिया पर तंज ना कस सके। 

 वरिष्ट पत्रकार एवं पूर्व चीफ रिपोर्टर, राजस्थान पत्रिका
अरिहन्त मीडिया, भीलवाड़ा
मो-9829537627
[email protected]

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