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दो प्यार भरे दिलों के बीच एक खास अहसास का प्रतीक है ये त्यौहार करवा चौथ

दो प्यार भरे दिलों के बीच एक खास अहसास का प्रतीक है ये त्यौहार करवा चौथ

हमारी संस्कृति और अध्यात्म में स्त्री को शक्ति का स्वरूप माना गया है। करवा चौथ का पर्व भी स्त्री-शक्ति की प्रतीति का पर्व है। दांपत्य जीवन और पुरुष का उत्कर्ष इसी शक्ति के प्रेम और उत्सर्ग पर टिका हुआ है। यह पर्व हमें स्त्री-शक्ति को समादृत करने का अवसर देता है। करवा चौथ (इस बार 4 नवंबर को) एक ऐसा अवसर है, जो वर्षों से वैवाहिक जीवन का भावनात्मक केंद्र बना हुआ है और यह हमें स्त्री-शक्ति की प्रतीति कराता रहा है। हिंदू संस्कृति में हमेशा ही स्त्री-शक्ति समादृत होती रही है। ईश्वर को जब हम साकार रूप में देखते हैं तो उन्हें स्त्री- पुरुष रूपों में ही देखते हैं।

श्रीहरि विष्णु के साथ हम मां लक्ष्मी को देखते हैं, शिव के साथ पार्वती को देखते हैं और राम के साथ सीता को देखते हैं। इतना ही नहीं, जब हम इनका स्मरण करते हैं, तो पहले स्त्री शक्ति का नाम आता है, बाद में परम पुरुष का। हम सीता-राम, राधा-कृष्ण, गौरी-शंकर आदि नामों से ईश्वर को याद करते हैं। करवा चौथ भी स्त्री-शक्ति की महत्ता को प्रतिपादित करता है और बताता है कि दांपत्य-जीवन में स्त्री का प्रेमपूर्ण आचरण और परिवार के प्रति उसका दायित्व कितना अनमोल है। हर साल कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को पड़ने वाले इस पर्व में पत्नियां अपने पति के मंगलार्थ निर्जल उपवास रखती हैं। वे इस दिन सजती-संवरती हैं और वह सभी शृंगार करती हैं, जो एक दुल्हन का शृंगार होता है। करवा चौथ का व्रत सभी हिंदू विवाहित महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि उनके द्वारा किया गया अन्न-जल का यह उत्सर्ग उनके पति की समृद्धि, दीर्घायु और कल्याण सुनिश्चित करता है।

करवा चौथ की पारंपरिक कहानी भी स्त्री-सशक्तीकरण का बोध कराती है। इसके अनुसार, वीरवती उर्फ करवा नामक एक महिला के पति को नदी में स्नान करते हुए एक मगरमच्छ ने पकड़ लिया था। करवा ने मगरमच्छ को एक ‘सूत’ से बांध दिया और यम से उसे नरक में भेजने के लिए कहा। यम ने मना किया, तो करवा ने यम को शाप देने की धमकी दी। मान्यता है कि पतिव्रता स्त्री में मृत्यु के देवता यम का भी सामना करने की शक्ति होती है। इस व्रत का संबंध महाभारत काल से भी बताया जाता है। कहा जाता है कि द्रौपदी ने भी इस व्रत का पालन किया था।

एक बार अर्जुन तपस्या के लिए नीलगिरि में गए और बाकी पांडवों को उनकी अनुपस्थिति में कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। द्रौपदी ने हताश होकर भगवान कृष्ण को याद किया और मदद मांगी। भगवान कृष्ण ने उन्हें बताया कि एक बार जब देवी पार्वती ने भगवान शिव से ऐसी ही परिस्थितियों में मार्गदर्शन मांगा था, तो उन्हें करवा चौथ के व्रत का पालन करने की सलाह दी गई थी। द्रौपदी ने निर्देशों का पालन किया और करवा चौथ का व्रत रखा। नतीजतन, पांडव अपनी समस्याओं से पार पाने में सक्षम हुए। इस दिन व्रत रखने वाली महिलाएं करवा चौथ की पौराणिक कथाओं को ध्यान से सुनती हैं। सत्यवान और सावित्री की कहानी भी उनमें से एक है, जो एक पतिव्रता स्त्री के जुझारूपन को दर्शाती है।

 

 

प्राचीन समय में लड़कियों की शादी छोटी अवस्था में हो जाती थी और उन्हें दूसरे गांवों में अपनी ससुराल में पर्दा प्रथा में ही रहना पड़ता था। करवा चौथ जैसे व्रत के माध्यम से गांव की सारी विवाहित महिलाएं एक-साथ एकत्रित होकर एकदूसरे से चर्चा कर पाती थीं। इससे उनमें सकारात्मक ऊर्जा आती थी और वे परिवार का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने का साहस पाती थीं। इस त्योहार ने इन महिलाओं को प्रेम और समानता का एक अनूठा अर्थ दिया। वे आपस में हंसती-बोलतीं, खुद को नकारात्मक विचारों से मुक्त करतीं और एक-दूसरे के लिए प्यार और सहानुभूति साझा किया करतीं। इस उत्सव ने उनके सशक्तीकरण का मार्ग प्रशस्त किया।उत्सव का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि पतियों को अपने जीवन में अपनी पत्नी के महत्व का एहसास होता है। यह स्त्रियों के त्याग और बलिदानों का प्रकटीकरण है, जो पतियों को यह एहसास दिलाता है कि पत्नियां जीवन के सभी क्षेत्रों में अपने पति के लिए नि:स्वार्थ भाव से काम करती हैं। इस भावना से मन में अपनी पत्नियों के लिए प्रेम उमड़ता है। प्रेम सकारात्मक ऊर्जा का सबसे शक्तिशाली स्रोत है और प्रेम ही करवा-चौथ का मूल हेतु है।

 

पहले ज्यादातर पत्नियां पति पर ही निर्भर हुआ करती थीं, लेकिन आज पत्नियां बराबरी का हिस्सा निभा रही हैं, आर्थिक रूप से पति का सहयोग भी कर रही हैं, ऐसे में भी इस व्रत ने पति-पत्नी के अटूट प्रेम की परंपरा को जीवित रखा है। यह पर्व दो प्यार भरे दिलों को एक-साथ लाने और एक-दूसरे को यह याद दिलाने का एक तरीका है कि विवाह स्वर्ग में भले ही तय होते हों, लेकिन दिल धरती पर ही धड़कते हैं। 

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