तृष्णा का त्याग किये बिना शान्ति नहीं-मुकेश मुनि

Mon 11 Feb 19  4:22 pm


चित्तौड़गढ़ (हलचल) । शांत-क्रांति संघ के जैन संत मुकेशमुनि  म.सा. ने सोमवार को अरिहन्त भवन में आयोजित धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि जीवन में धन आवश्यक है किन्तु     धर्म अनिवार्य है। जिस प्रकार भोजन जीवन के लिये आवश्यक है और श्वास अनिवार्य है। भोजन के बिना कुछ दिन रहा जा सकता है। किन्तु श्वास के बिना नहीं। हमारी भूल यह हो रही है कि हम आवश्यक धन को अनिवार्य मान बैठे हैं और अनिवार्य धर्म को महत्व कम दे रहे हैं। यही कारण है कि धन के पीछे इतनी दौड़ लगा रहे हैं  कि आत्म कल्याण के लिये अनिवार्य धर्म को भूल बैठे हैं। 

आपने कहा कि धर्मसाधना और वीतराग वाणी सुनने के प्रति हमारी उदासीनता बढ़ती जा रही है। प्राप्त को अपर्याप्त मानकर धन कमाते समय यह भी ध्यान नहीं रखते कि क्या उचित है और क्या अनुचित। तृष्णा का त्याग किये बिना जीवन में शान्ति नहीं है। इस शाश्वत सत्य को भी स्वीकार नहीं करते। ज्यों-लाभ बढ़ता है, लोभ उतना ही बढ़ता जाता है और व्यक्ति केवल धन कमाने की होड़ में दौड़ता-दौड़ता दम तोड़ देता है।

उन्‍होंने कहा कि जिन परिवारों ने धर्म को किनारे रखकर अपना जीवन केवल धन कमाने में लगाया, उनकी दशा हमसे छिपी नहीं है, फिर भी हम सीख नहीं लेकर धन को प्रमुखता दे रहे हैं। हमारे आत्मकल्याण में केवल धर्म सहायक है, यह सुनते हैं पर उसे अनसुना कर फिर धन कमाने की दौड़ में लग जाते हैं। इस धन ने कभी किसी को शांति और समाधि नहीं दी अपितु परिवारों के मधुर रिश्ते तोड़े हैं।

धन एवं धर्म पर सुन्दर विवेचन करते हुए आपने कहा कि इस धन ने सद्गुणों को समाप्त किया है। मानवीय गुणों का धन कमाने की लिप्सा में सर्वनाश हुआ है। आगम में अनेकों उदाहरण है कि जिन्होनें धन के प्रति आसक्ति को तजकर धर्म को जीवन में प्रमुखता दी उनका आत्म कल्याण हो गया और जिन्होनें धन के प्रति आसक्ति रखी उनकी दुर्गति हुई है। धन का परोपकार व दान से सदुपयोग करने वालों को हम आज भी श्रद्धा से स्मरण करते है। आपका मंगलवार का प्रवचन भी अरिहन्त भवन में होगा। कार्यक्रम का संचालन मन्त्री विमलकुमार कोठारी ने किया।

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