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 ...तो यह था नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा का असल मकसद !

 ...तो यह था नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा का असल मकसद !

 

अमेरिकी संसद के निचले सदन ' हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ' की स्पीकर नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा के बाद चीन बुरी तरह से बौखला गया है । चाइना द्वारा इस मामले में अमेरिका को आग से नहीं खेलने की लाख चेतावनी दिए जाने के बावजूद पेलोसी ने ताइवान की यात्रा करके चीन की अच्छी - खासी अंतरराष्ट्रीय बेइज्जती कर दी है । चाइना फिलहाल ऐसी स्थिति में नहीं है कि वो अमेरिका से इस यात्रा बाबत कोई सीधे-सीधे सैन्य लड़ाई छेड़ने की हिमाकत कर सके । हां , खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे की तर्ज पर ड्रैगन ने यह अवश्य किया है कि अपने कुछ लड़ाकू विमान ताइवान की वायु सीमा में भेज दिए जो कुछ देर चक्कर काटकर वापस चाइनीज़ एयरपोर्ट पर लौट आए , इसी प्रकार ताइवान पर चंद आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए और ताइवान से कुछ ही दूरी पर समंदर में मिसाइलें दागने का अभ्यास शुरू कर दिया । वैसे , चाइना यह सब पहले भी करता रहा है और इसमें कोई खास नई बात नहीं है ।
अब , अंदर की बात यह है कि अमेरिका ने अपने निचले सदन की स्पीकर नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा बहुत ही चतुराईपूर्ण ढंग से संपन्न करवाई है । इससे चीन को सीधा-सीधा संदेश दे दिया है कि सब कुछ उसी की इच्छानुसार ही संपन्न नहीं होगा । साथ ही , अमेरिका ने इस यात्रा के सहारे अपनी हथियार निर्माता कंपनियों का भी हित साध लिया है । वो ऐसे कि चीन से कोई सीधा - सीधा टकराव नहीं हो इसलिए स्वयं अमेरिकी राष्ट्रपति जो. बाइडेन ने भी ' वन चाइना पॉलिसी ' का सम्मान करते हुए नैंसी की ताइवान यात्रा का समर्थन नहीं किया । यही नहीं , राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के बाद अमेरिका की तीसरी ताकतवर शख्सियत होने के बावजूद पेलोसी अमेरिकी सरकार का प्रतिनिधित्व नहीं करती । ऐसा इसलिए क्योंकि निचले सदन की स्पीकर होने के करण नैंसी पेलोसी का रोल बिल्कुल निष्पक्ष होता है ,  जिसका अमेरिका के दोनों प्रमुख राजनीतिक दल रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी से कोई लेना - देना नहीं है । साथ ही वर्ष 1997 में भी अमेरिकी सदन के तत्कालीन स्पीकर ने ताइवान की यात्रा की थी । इस लिहाज से यह कोई नई परंपरा नहीं है और पहले भी ऐसा होता रहने के कारण अब ऐसी कोई वजह नहीं बनती कि चीन सिर्फ नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा से चिढ़कर अमेरिका से सीधा टकराव मोल ले ले । लिहाजा चाइना की गीदड़ भभकियों के बाद अमेरिका में आपात बैठक तो हुई लेकिन वह किसी सैन्य कार्यवाही को लेकर नहीं अपितु इस बात पर विचार कर रही थी कि ताइवान को इतने ज्यादा हथियार मुहैया करवा दिए जाएं कि चाइना झिझककर ताइवान के खिलाफ भी कोई सैन्य कार्रवाई नहीं कर सके । अब हम आसानी से समझ सकते हैं कि अमेरिका के हथियार बिकेंगे तो फायदा उसकी हथियार बनाने वाली कंपनियों को ही होगा । इस बात की पुष्टि इससे भी होती है कि ताइवान की राष्ट्रपति  साईं इंग वेन ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि नैंसी पेलोसी की यात्रा के बाद चीन द्वारा सैन्य कार्यवाही करने का खतरा बहुत बढ़ गया है । ऐसे में यदि चीन हमला करता है तो ताइवान को इसका जवाब देना ही पड़ेगा और जवाब देने के लिए हथियारों की आवश्यकता होगी जोकि अमेरिका ही मुहैया करवाएगा । अब अमेरिका हथियार खैरात में तो देगा नहीं बल्कि हथियारों की एवज में करोड़ों - अरबों डॉलर वसूल करेगा । सीधे-सीधे शब्दों में कहें तो अमेरिका ने अपने हथियार बेचने की खातिर ही नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा करवाकर चीन और ताइवान के मध्य तनाव को चरम पर पहुंचवा दिया । यह ठीक वैसा ही है जैसा यूक्रेन को नाटो में शामिल करने का विश्वास देकर रशिया को इतना चिढ़ा दिया कि उसने यूक्रेन पर धावा बोल दिया । चूंकि रूस ने हमला बोला तो यूक्रेन को उसका मुकाबला करने के लिए हथियार खरीदने ही थे जो कि अमेरिका मुहैया करवा रहा है । तो अब देखना यह है कि चाइना भी रशिया की ही भांति झल्लाकर ताइवान पर हमला करके अमेरिका के हित साधता है अथवा अपने दिमाग को काम में लेकर कूटनीति से अपने अपमान का बदला लेता है ।