boltBREAKING NEWS

...भाई ! हमारा कसूर क्या था ?

...भाई ! हमारा कसूर क्या था ?

हम तो शांतिपूर्वक अपने सनातन धर्म और प्राचीन संस्कृति के अनुसार नववर्ष का स्वागत करने और आमजन के सुख एवं वैभव की कामना के लिए हर्षोल्लास के साथ शांतिपूर्वक नाचते - गाते शोभायात्रा निकाल रहे थे । धर्म की जय हो , अधर्म का नाश हो , प्राणियों में सद्भावना हो और विश्व का कल्याण हो जैसे उद्घोष कर रहे थे ।
हम तो बिना किसी का धर्म पूछे मिश्री , नीम की कोपलों और काली मिर्ची का प्रसाद वितरित कर रहे थे ताकि नववर्ष की शुभवेला पर मीठा , कड़वा और तीखा खाकर आने वाले समय में प्रत्येक परिस्थिति व  उतार-चढ़ाव का व्यक्ति धैर्य के साथ मुकाबला कर सके ।
 अपने इस निःस्वार्थ कृत्य के दौरान हमने किसी का बुरा करना तो दूर ,  बुरा करने का विचार तक नहीं किया । फिर उपासना स्थल से हम पर सिर्फ कंकर - पत्थर ही नहीं अपितु मोटी - मोटी शिलाएं क्यों फेंकी गई ? दैनिक भास्कर के रिपोर्टर की मानें तो पथराव के दौरान जब अफरा-तफरी मच गई तब शोभायात्रा में कई नकाबपोश लाठी , सरिए व चाकू लेकर घुस गए । इन नकाबपोशों ने बदहवास होकर भाग रहे निहत्थे व बेकसूर लोगों पर हमला करके उन्हें गंभीर रूप से घायल क्यों किया ? वाहन रैली में शामिल जो गाड़ियां मौके पर छूट गई उन्हें तोड़ - फोड़कर कबाड़ क्यों बनाया गया ? दुकानों व मकानों में चुन-चुनकर आग क्यों लगाई गई ? वो तो भला हो नेत्रेश शर्मा जैसे जांबाज पुलिसकर्मियों व अधिकारियों का जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर कई निर्दोषों को जिंदा जलने से बचा लिया अन्यथा कैसी अनहोनी होती , कोई नहीं जानता । आखिर लोगों को जिंदा जलाने की योजना बनाई ही क्यों गई ? यह सब चंद मिनटों में तो हुआ नहीं होगा , फिर इस घृणित योजना की जानकारी सरकारी कारिंदों तक समय रहते क्यों नहीं पहुंची ? 
 उक्त सभी सवालों की ईमानदारी से समीक्षा करने और दोषियों को कानूनसम्मत कठोर दंड दिलवाने की बजाय प्रदेश के मुखिया ने बड़ी ही बेबाकी से सारा दोष विपक्षी पार्टी के राष्ट्रीय प्रमुख पर मढ़ दिया । कहा - यह राजस्थान में आए हैं इसलिए दंगा हुआ है । जबकि वरिष्ठ पत्रकार भूपेंद्र ओझा की बात पर विश्वास करें तो विपक्षी पार्टी के राष्ट्रीय प्रमुख राजस्थान के एक रिसोर्ट में अपने परिवार के सामाजिक समारोह में भाग लेने के लिए आए थे । अब जिसके खुद के घर में काम है वो क्या दंगा भड़काने की योजना बनाएगा ? फिर भी यदि उन्होंने ऐसा दुष्कृत्य किया है तो प्रदेश के मुखिया अपनी तमाम सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करके विपक्षी पार्टी के राष्ट्रीय प्रमुख के खिलाफ जांच कर उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही क्यों नहीं करते ?
 अब फिर लौटते हैं अपने मूल सवाल पर कि ...भाई ! हमारा कसूर क्या था ? तो कसूर दुनिया का भला चाहते हुए नववर्ष पर शोभायात्रा निकालने वालों का नहीं था बल्कि कसूरवार वो हैं जिनके हौंसले छबड़ा में दंगे करने पर यू.पी. जैसी कठोर कार्यवाही नहीं होने से बुलंद हैं । फिर भी हो यह रहा है कि भविष्य में शांतिपूर्वक निकाली जाने वाली शोभायात्राओं पर कठोर प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं ।
 ऐसे में हमारा कसूर यह है कि हम बहुसंख्यक होते हुए भी शांतिप्रिय और सीधे है । दुनिया का दस्तूर है कि जो सीधा होता है वह सबसे पहले काटा जाता है , इसलिए कटने , मरने , लुटने , पिटने व जिंदा जलने के लिए तैयार रहें । तारीख गवाह है कि हमारे साथ पहले भी यही होता आया है और आगे भी तब तक होता रहेगा जब तक हमारा अस्तित्व कायम है ।