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भाई की यादें

भाई की यादें

 

अन्तिमा सोकर उठी तो आज भी बाहर कोहरा छाया हुआ था। ठंडी हवा चल रही थी। उसने घड़ी देखी। आठ बज रहे थे। आज भी बाई अभी तक नही आई। मरी अब क्या आयेगी, कोई बहाना लगा देगी। एक नम्बर की बहानेबाज है। बह कुछ देर तक झुंझलाकर रह गई। किचन में जाकर चाय बनाई। एक कप चाय अखबार पढ़ रहे सुमरेश को दे आई। खुद जल्दी से चाय पीकर किचन के काम में लग गई। 

थोड़ी देर बाद उसने अपने बेटे रोहन को जगाया और जल्दी फ्रेश होकर डाइनिंग टेबल पर रखे गिलास का दूध पीने को कहा, वह तेजी से झाड़ू लगाने लगी। नहा धोकर खाना बनाने लगी। बार-बार घड़ी की ओर देख काम को और शीघ्रता से निपटाने लगी। कल भी वह स्कूल देर से पहुंची थी। प्रिंसिपल की दो बातें सुननी पड़ी थी। और आज भी शर्म से सर झुकाने की नौबत आयेगी।

सुमरेश खाना खाकर ऑफिस चले गये। वह भी अपना खाने की टिफिन जमा, रोहन को हिदायतें देती, जाने के लिये सीढ़ियां उतर गई। दस बज रहे थे। अभी वह अपनी स्कूटी स्टार्ट कर ही रही थी कि रोहन बालकनी में आकर बोला-‘मम्मी लल्लू भैया का फोन है।’ उसे ध्यान आया कि वह अपना मोबाइल यहीं भूले जा रही थी। रोहन मम्मी का मोबाइल लेकर नीचे आया। अन्तिमा ने कहा -‘हैलो!’ उधर से घबराती सी आवाज आई, ‘बुआ! पापा जी को हार्ट अटैक हुआ है। अब वह नहीं रहे।’

अन्तिमा अपने एक मात्र बड़े भाई की ऐसी खबर सुन सुन्न सी रह गयी। उसे लगा जैसे वह बर्फ की सिल्ली पर खड़ी है। शरीर एक दम ठंडा पड़ गया। स्टार्ट की हुई स्कूटी बंद कर वह घर की सीढ़ियां चढ़ गई। आंखें सावन की तरह बरसती रही। रोहन पूछने लगा-‘मम्मी क्या हुआ, क्यों रो रही हो?’ दस मिनट तक वह कुछ बोल नहीं पाई। रुलाई कुछ कम हुई तो उसने रोहन से कहा-‘तेरे मामाजी नहीं रहे। उन्हें हार्ट अटैक आया है।’ यह सुन रोहन की आंखें भी छलछला आईं।

अन्तिमा ने प्रिन्सिपल को मोबाइल पर सारी बात बताते हुए कुछ दिनों के अवकाश के लिये बोल दिया। इस बीच रोहन ने भी अपने पापा को फोन कर इस अप्रिय हादसे की जानकारी दे दी। इस खबर को सुन वह भी स्तब्ध रह गये। वह भी जल्द ही घर लौट आये। उन्होंने अन्तिमा को धीरज बंधाया। 

उन्होंने जल्द ही बारां जाने का कार्यक्रम बनाया। अन्तिमा ने तो खाना भी नहीं खाया। वे जल्द ही तैयार होकर ऑटो से बस स्टैंड पहुंचे। संयोग से तब बारां जाने वाली गाड़ी भी खड़ी थी। बस में बैठने के कुछ समय बाद एक्सप्रेस बस लोकल की तरह चलने लगी। पता नहीं कब तक पहुंचायेगी? अन्तिमा को लग रहा था कि वह अन्तिम बार अपने भाई को देख ले। सुमरेश ने तो ड्राइवर से कहा भी ‘एक्सप्रेस बस है तो एक्सप्रेस की गति से चलो। हमें बारां जल्दी पहुंचना है।’ 

भाई कौशल को अचानक एक सप्ताह पूर्व हार्ट में दर्द उठा था। डॉक्टर को दिखाया और ईसीजी करवाई, जो कुछ ठीक नहीं बता रही थी। उन्हें डॉक्टर ने जल्द ही कोटा हार्ट स्पेशलिस्ट को दिखलाने का परापर्श देते हुए कुछ जरूरी मेडिसन दे दी। 

कौशल अगले दिन सुबह परिवार के साथ चाय पी रहे थे कि अचानक हार्ट में दर्द उठा। तबीयत बिगड़ गई और देखते ही देखते बेहोश होकर वहीं लुढ़क गये। लल्लू दौड़कर पास वाले डॉक्टर को बुला लाया। डॉक्टर ने देखा और अप्रिय समाचार सुना दिया-‘इनको हार्ट अटैक हुआ है। और अब जीवन भी समाप्त हो गया।’ यह सुनते ही परिवार पर जैसे दुख का पहाड़ आ गिरा हो। 

अब परिवार को पूर्व में डॉक्टर की दी हुई सलाह कोटा हृदय रोग विशेषज्ञ को जल्द दिखलाने की याद आने लगी। कितना अच्छा होता कि भाई कौशल समय रहते पहले ठीक से चैकअप करवाकर सुरक्षित इलाज करवा लेते। भाई अभी तो साठ के भी नहीं हुए थे। मजबूत गठीला बदन, हंसमुख रहने वाला चेहरा और परिवार का ठीक पालन करने वाले कौशल का जीवन बच जाता। 

कुछ ही समय में अब बस की स्पीड भी एक्सप्रेस भी हो चली। इधर अन्तिमा के मन की गति भाई के साथ बिताये दिनों में पहुंच गई। बचपन में मैं और भाई खूब धमाचौकड़ी मचाते। अपनी शैतानियों से सबको परेशान करके रख देते। कभी भाई परेशान करता तो वह पिताजी का डर बता कर उसे चुप करा देती। लेकिन थोड़ी देर बाद भाई उसे फिर खेलने के लिये बुला लेता। मां भी दोनों की लड़ाई और फिर मिलकर खेलते देख कहती, ‘तेरे मेरी बने नहीं, तेरे बिना सरे नहीं।’ 

हम अलग-अलग स्कूल में पढ़ते थे। मैं छोटी थी लेकिन पढ़ने में भाई कौशल से होशियार थी। भाई को भी कई बार कई बातों का ज्ञान देती। तब भाई कहता-‘अन्ती तू तो सचमुच होशियार है, बड़ी होकर मास्टरनी बनेगी।’ और मैं उसकी बात पर हंसकर रह जाती।

भाई शाम को दोस्तों के साथ खेलने निकल जाता। मैं मां के काम में हाथ बंटाती। 

त्योहारों पर हमारा अच्छा साथ रहता। वह अपने क्षेत्र की होली को अन्य आसपास जलने वाली होलियों से सम्पन्न बनाये रखने का पूरा प्रयास करता। होली में जलाने वाली वस्तुएं एकत्र करने के लिये वह अपने मित्रों के साथ मुझे भी ले जाता। सचमुच होली के दिन वह लकड़ी, कंडे, गत्ते तथा अन्य वस्तुओं से उसे बड़ा रूप देता। होली ऊंचाई के साथ शान से जलती। हम सब बच्चे ताली बजाकर खुशी जाहिर करते।

मकर संक्रान्ति जब आने वाली होती तो भाई भी पड़ोस के लड़कों के साथ पतंग उड़ाता। उसने मुझे भी पतंग उड़ाना सिखा दिया। मैं अकेली भी कई बार पतंग उड़ाती पर कोई पेंच में फांद देता तो मेरी पतंग कट जाती। भाई ने एक दिन मुझे पेंच लड़ाने की कला बतलाई। धीरे-धीरे मैं भी पेंच लड़ने पर दूसरों की पतंग काट देती। मैं खुश होकर मां को आवाज देकर बताती। संक्रान्ति के दिन हम सुबह से ही छत पर कई रंगबिरंगी पतंगें और मांझे वाली डोर गिड़गिड़ी लेकर पहुंच जाते। मां खाना खाने के लिये बुलाती रहती पर हम अभी आते हैं कहकर शाम तक भी नीचे नहीं उतरते।

परीक्षा के दिनों में हम एक ही कमरे में पढ़ते। भाई बस उतनी ही पढ़ाई करता, जिससे वह पास होकर अगली कक्षा में चला जाये। मैं देर रात पढ़ती लेकिन वह जल्द सो जाता। पढ़ाई के चलते हम गपशप भी करते। यह हमारे मनोरंजन का एक हिस्सा होता। मां कभी चाय बना कर लाती, ताकि अधिक देर तक पढ़ने में सुविधा रहे। भाई कभी पढ़ते हुए किसी बात पर गुस्सा होता तो मैं भी उससे गुस्सा होकर मां के कमरे में जाकर पढ़ने लगती।

रक्षा बंधन पर भी मैं भाई के बहुत देर तक राखी नहीं बांधती। उससे कहती ‘इक्कीस रुपये देगा तो बांधूंगी राखी। मेरी सहेली का भाई भी इक्कीस रुपये देता है।’ वह कहता-‘मैं अभी कमाई थोड़े ही कर रहा हूं। फिर थोड़ी देर बाद कहता- ‘चल आजा तू कहेगी वही दूंगा।’ उसकी बात से मैं खुश हो जाती। तिलक लगा राखी बांधती। उसकी लम्बी उम्र की कामना करती।

जब भाई सरकारी टीचर बन गया तो उसने पहली राखी में ही मुझे एक सौ एक रुपये दिये। मैं उसकी दरियादिली पर खुश हो जाती। मां कहती-देख तेरा भाई तुमसे कितना प्यार करने लगा है।

पढ़ाई के दौरान मैं स्कूल में वादविवाद और गायन में बेहतर प्रस्तुति दिया करती थी। खेलकूद प्रतियोगिता में जब कभी वाद-विवाद प्रतियोगिता अथवा गीत गायन में आसपास अन्य स्कूल में जाना होता तो भाई मुझे साइकिल पर बिठाकर ले जाता। रास्ते में मेरी हौसला अफजाई भी करता। मैं कभी प्रतियोगिता में प्रथम तो कभी द्वितीय स्थान पर रहती। पुरस्कार मिलता तो घर पर आकर मां से कहता- ‘मेरी ही वजह से मिला है इसे यह पुरस्कार।’ मैं कहती-भाग तो मैंने लिया है। तैयारी भी जमकर की थी। तब जाकर यह पुरस्कार मिला है भैया। और फिर वह हंसता हुआ कहता-‘अरे! नाराज मत हो, मैं तो मजाक कर रहा था मेरी प्यारी बहन।’

जब मैं कॉलेज पढ़ने जाने लगी और कभी लेट हो जाती तो वह मुझे अपनी साइकिल से छोड़ आता। इससे मेरी क्लास मिस नहीं होती।

जब मेरी शादी हुई तो विदाई के समय वह मुझसे गले मिलकर खूब देर तक रोता रहा। जैसे उसके बचपन के प्यार-स्नेह की जमा पूंजी छिने जा रही हो। 

मैं भाई के साथ जीवन के महत्वपूर्ण पलों की यादों में खोती रही। लेकिन इन यादों का सिलसिला तब टूटा जब साथ में बैठे सुमरेश ने कहा-‘चलो उठो बारां आ गया।’ बस से उतर कर हमने ऑटो किया और गलियां पार करते घर पहुंच गये।

बाहर लोगों की भीड़ लगी थी। बस भाई की अन्तिम यात्रा की तैयारी थी। लल्लू ने कहा-बुआ आपका ही इन्तजार कर रहे थे। भाई के अन्तिम दर्शन कर मैं रो पड़ी। रोती हुई मां के गले लग गई। थोड़ी देर में ही अंतिम यात्रा शुरू हो गई। मैं बाहर चबूतरे पर खड़ी हो गली के मोड़ तक उसे देखती रही। भाई के साथ जिया जीवन सदा यादों में बना रहेगा।

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