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लास्‍ट स्‍टेज के ब्‍लड कैंसर मरीजों पर कारगर है CAR-T cell थेरेपी, भारत में पहली बार दी गई अंजाम

लास्‍ट स्‍टेज के ब्‍लड कैंसर मरीजों पर कारगर है CAR-T cell थेरेपी, भारत में पहली बार दी गई अंजाम

नई दिल्‍ली । शिमेरिक एंटीजेन रिसेप्टर टी-सेल (सीएआर-टी) थेरेपी को कैंसर के मरीजों पर रामबाण के रूप में सामने आई है। इसको लेकर दुनियाभर में क्‍लीनिकल ट्रायल हुए हैं जिसमें इसके रिजल्‍ट काफी अच्‍छे आए हैं। गंभीर रूप और लास्‍ट स्‍टेज वाले ब्‍लड कैंसरके मरीजों पर इसके टेस्‍ट उत्‍साहपूर्ण हैं। इस थेरेपी के कारगर होने की क्षमता के बावजूद भी भारत के पास ये उपलब्‍ध नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि इस पर आने वाला खर्च करोड़ों का है। इसलिए डॉक्‍टरों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती इस तकनीक को सस्‍ती दर पर मुहैया करवाने की है। इसके इतना महंगा होने की एक बड़ी वजह ये भी है कि इस थेरेपी की प्रक्रिया काफी जटिल है। इस थेरेपी के महंगा होने का मुख्य कारण यह है कि इसके बनाने की प्रक्रिया बहुत जटिल है।

पीआईबी से मिली जानकारी के मुताबिक इस मकसद को पूरा करने की शुरुआत जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (बाइरैक) और बायोटेक्नोलॉजी विभाग (डीबीटी) ने की है। 4 जून, 2021 को टाटा मेमोरियल अस्पताल, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई की टीम ने कैंसर केयर के साथ मिलकर भारत में पहली बार सीएआर-टी सेल थेरेपी को अंजाम दिया है। आपको बता दें कि ये एक तरह की जीन थेरेपी है। इसे टाटा मेमोरियल सेंटर के एसीटीआरईसी के बोनमैरा ट्रांसप्‍लांट डिपार्टमेंट ने किया है। सीएआर-टी सेल्स को आईआईटी-बी के जैव-विज्ञान एवं जैव-इंजीनियरिंग विभाग ने डिजाइन और उसका निर्माण किया था। आपको बता दें कि भारत में इसको जीन थेरेपी की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है। फिलहाल अभी पायलट क्लीनिकल ट्रायल है किया गया है। केंद्र के बाइरैक ने इस थेरेपी के पहले और दूसरे चरण के क्लीनिकल ट्रायल को पहली बार इंसानी शरीर पर करने के लिए 19 करोड़ रुपये से अधिक की राशि मंजूर की है। आईआईटी-मुंबई के डायरेक्‍टर ने इस शानदार उपलब्धि के लिए वैज्ञानिकों को बधाई दी है। उनका कहना है कि आगे भी यदि इसके परीक्षण कामयाब होते हैं, तो भारत में इसे सस्ती दरों पर उपलब्ध कराकर सैकड़ों मरीजों की जान बचाई जा सकती हैं। उनका कहना है कि ये थेरेपी लोगों में नई उम्‍मीद जगाने वाली है।