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इलेक्ट्रॉनिक कचरा, पर्यावरण और मानव-स्वास्थ्य के लिए खतरा !

इलेक्ट्रॉनिक कचरा, पर्यावरण और मानव-स्वास्थ्य के लिए खतरा !

राजसमन्द (राव दिलीप सिंह) आज संपूर्ण विश्व में इलेक्ट्रॉनिक कचरे के प्रति आमजन को जागरूक करने के उद्देश्य से पुनः उपयोग करने, वसूली और पुनरनियोजन (पुनर्चक्रण) हेतु प्रोत्साहित करने के लिए 14 अक्टूबर को "चतुर्थ अंतरराष्ट्रीय ई-कचरा दिवस-2021" के रूप में मनाया जा रहा है ! वर्ष 2021 के लिए अंतरराष्ट्रीय ई-कचरा दिवस का विषय - "उपभोक्ता परिपत्र अर्थव्यवस्था की कुंजी है" रखा गया है ! वर्तमान समय में विकसित हो रहे विश्व में इंसानी दुनिया का यंत्रों पर निर्भरता व उपयोगिता बेतहाशा बढ़कर लत का रूप लेती जा रही है, जिसके कारण भारत सहित अधिकांश देशों में दिन-ब-दिन ई-कचरा की समस्या भयावह रूप लेती जा रही है ! संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार - दुनिया भर में 7.5 किलोग्राम प्रति व्यक्ति ई-कचरो का उत्पादन कर रहा है ! वर्ष 2020 और वर्ष 2030 की अवधि में वैश्विक ई-कचरे में तकरीबन 38 से 40% तक की बढ़ोतरी होना बताया गया है ! संपूर्ण दुनिया में लगभग प्रतिवर्ष 50 लाख टन ई-कचरा उत्पन्न हो रहा है ! यही अप्रत्याशित बढ़ोतरी भारत में भी तेजी से हो रही है और भारत देश प्रतिवर्ष लगभग 3.5 मिलियन टन ई-कचरे का उत्पादन कर रहा है ! अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी के बाद भारत पांचवे स्थान पर, ई-कचरा उत्पादक देश बना हुआ है ! जहां तो अभी तक औपचारिक क्षेत्र की पुनर्चक्रण क्षमता का विकास संभव नहीं हो पाया है और इसके दुष्परिणाम के रूप में, यहां की प्रकृति एवं मानव स्वास्थ्य पर घातक विपरीत पार्श्व प्रभाव परिलक्षित हो रहे हैं !

क्या है ई-कचरा ?

ऐसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है या यंत्र जिनमें कंप्यूटर, टेलीविजन, वाशिंग मशीन, फ्रिज, एयर कंडीशनर्स, मोबाइल, लैपटॉप, प्रेस, इलेक्ट्रॉनिक खिलौने, घरेलू उपकरण तथा उनसे जुड़े अन्य उत्पाद, जब चलन या उपयोग से बाहर हो जाते हैं तो इन्हें संयुक्त रूप से "ई-कचरा" कहा जाता है ! देश में जैसे-जैसे इंसान की यंत्रों पर निर्भरता या डिजिटाइजेशन बड़ा है, उसी अनुपात में ई-कचरा भी बढ़ रहा है ! इस इलेक्ट्रॉनिक कचरे का पृथ्वी पर उत्पन्न होने का मुख्य कारण मानव का यंत्रवत होना अथवा तकनीकी पर निर्भरता है, जो कि अब मानवीय जीवनशैली का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है !

ई-कचरा एवं मानव स्वास्थ्य....

              इलेक्ट्रॉनिक कचरे के साथ मानव स्वास्थ्य और प्रदूषण संबंधी गहरी चुनौतियां भी जुड़ी है ! विशेषकर, घरों में इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जैसे - ट्यूब लाइट, एलइडी बल्ब, सीएफएल, बच्चों के खिलौने, फ्रिज, एयर कंडीशनर, टेलीविजन, कंप्यूटर, आदि में मरकरी, कैडमियम और क्रोमियम जैसे विषैले तत्व तथा गैस शामिल होते हैं ! इन उपकरणों की खराबी पर, उनके निस्तारण के कुप्रबंधन व असुरक्षित तौर-तरीके से प्राकृतिक जल-स्रोत जैसे- नदी नालों का प्रभाव क्षेत्र, कुए व बावड़ियों, में प्रदूषण का जोखिम बढ़ जाता है और मानव स्वास्थ्य व पर्यावरण पर विपरीत तथा घातक प्रभाव पड़ता है और इंसानों सहित मवेशियों व पादप जगत में तरह-तरह की प्राण- घातक बीमारियां जन्म ले रही है !

ई-कचरा उचित निस्तारण, प्रबंधन एवं पुनर्चक्रण होना जरूरी.....

         ऐसा आकलन है कि भारत प्रतिवर्ष 3.5 मिलियन टन ई-कचरे को उत्पन्न करता है, जिसमें स्क्रीन, मॉनिटर, ऊर्जा उत्पादक लैंप, सूचना प्रौद्योगिकी एवं दूरसंचार उपकरण तथा घरेलू उपकरण प्रमुख तौर पर शामिल है ! जिनके निस्तारण, प्रबंधन एवं पुनर्चक्रण की माकूल व्यवस्था नहीं है और ई-कचरे में मौजूद विभिन्न प्रकार के विषाक्त पदार्थों एवं धातुओं से संपूर्ण प्रकृति के जैविक एवं अजैविक घटक दुष्प्रभावित होते हैं ! इस हेतु उचित ई-कचरा निस्तारण व प्रबंधन की युक्तियां विकसित की जानी चाहिए !

ई-कचरे के खतरों से आमजन को शिक्षित करना बेहद जरूरी....

            वैश्विक स्तर पर जीवन स्वास्थ्य के लिए खतरा बन चुके ई-कचरा निपटान एवं निस्तारण प्रबंधन के लिए, आमजन को जागरूक व शिक्षित करना, अति आवश्यक हो गया है ! साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ई-कचरे के खतरों के प्रति सजगता लाने के लिए, इसमें अंतर्निहित संदेश व जानकारियों को व्यक्तियों, परिवारों, शिक्षकों, विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और समुदायों को विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से पहुंचाया जाना चाहिए ! ताकि, स्वच्छ व स्वस्थ भारत मिशन के लक्ष्यों के अनुरूप गैर जिम्मेदार और अनुचित ई-कचरा निपटान के कारण होने वाले प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभाव को कम किया जा सके और पुनर्चक्रण द्वारा पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के खतरों को कम करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता एवं संकल्प को साकार रूप दिया जा सके !

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