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सब कुछ दांव पर लगा दिया फिर भी मेरा नाम जोकर फिल्म लोगों के गले नहीं उतरी

सब कुछ दांव पर लगा दिया फिर भी मेरा नाम जोकर फिल्म लोगों के गले नहीं उतरी

 

‘मेरा नाम जोकर’ राजकपूर की ड्रीम फिल्म थी या कहिए फिल्मी करिअर में उनका ड्रीम प्रोजेक्ट। यह फिल्म उनके इतने नज़दीक थी कि इसकी कामयाबी के लिए उन्होंने सब कुछ दांव पर लगा दिया। फिल्म लोगों के गले नहीं उतरी। समीक्षक भी इसे समझ नहीं पाए और फिल्म सिनेमा हालों में लगते ही उतर गई। फिल्म के दो इंटरवल हुए और यह साढ़े तीन घंटे की मूवी थी। इतने फिलोसोफिकल टॉपिक को सही ट्रीटमेंट देना मुश्किल काम था। राजकपूर ने इसे आम दर्शकों के स्तर पर समझाने की बहुतेरी कोशिश की, लेकिन लोग नहीं समझ पाए। हालांकि बाद के समीक्षकों ने इसे शताब्दी की फ़िल्म भी करार दिया। लेकिन शुरुआती झटकों ने राजकपूर का दिल ही तोड़ दिया। ‘ए भाई ज़रा देख के चलो’ गाना इस फिल्म के विषय की ओर इंगित करता है। सर्कस के जोकरों के जीवन पर इससे बेहतर फिल्म और नहीं बनी। यह फिल्म बाद में क्लासिक बन गई थी जो शताब्दी की 20 बॉलीवुड की अव्वल फिल्मों में से एक थी। फिर तो देश-विदेश में खूब टिकट बिके। अकेले रूस में ही 73.1 मिलियन टिकट बिके। इस फिल्म का आइडिया भी राजकपूर का था जिसे क्रियान्वित किया ख्वाजा अहमद अब्बास ने पटकथा लेखन का रूप देकर। जब कहानी आई तो निर्देशन में आगे बढ़े राजकपूर। उन्होंने ही फिल्म का संपादन किया और उन्होंने ही आरके फिल्म्स के बैनर तले इसे प्रोड्यूस किया। इस फिल्म में राजकपूर जोकर के रूप में ऐसा पात्र सामने आता है, जिसके माध्यम से हम सिम्मी ग्रेवाल, केसनिया (रूसी) तथा पद्मिनी से परिचित होते जाते हैं। यह फिल्म राजकपूर के दूसरे बेटे ऋषि कपूर की डेब्यू फिल्म भी थी।

फिल्म यूं शुरू होती है-तीन महिलाएं सिमी ग्रेवाल, केसनिया, पद्मिनी जिन्होंने राजू जोकर का नजरिया बदला, उसे सजाया-संवारा, मगर शादी की तो समाज के तथाकथित रुतबे वाले पुरुषों से। राजकपूर की लंबी फिल्मों में पहली ‘संगम’ थी जो ब्लॉकबस्टर थी और यह 1964 में रिलीज हुई थी और दूसरी ‘मेरा नाम जोकर।' यह 1970 में रिलीज हुई थी। यह वह समय था जब धर्मेंद्र और राजेश खन्ना के रोमांटिसिजम का अलग से दर्शक वर्ग तैयार हो चुका था। अमिताभ की एंट्री हो चुकी थी। राजेंद्र कुमार का बाकायदा लड़कियों पर जादू बरकरार था। मतलब हल्का-फुल्का मनोरंजन, एक्शन फिल्मों की आमद हो चुकी थी। ऐसे में राजकपूर की संजीदा फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ समाज के सामने सर्कस के जोकर की जिंदगी को लेकर प्रस्तुत हुई। तब तक दर्शक रोमांस और एक्शन में इतना खो चुके थे कि उनको इस फिल्म के फलसफे को समझने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। इसलिए यह फिल्म पहली मर्तबा तो धड़ाम से गिरी। दर्शकों की पहली रिजेक्शन राजकपूर को इतनी नागवार गुजरी कि वह पैसे-धेले को लेकर तो खाली हो ही चुके थे, मगर सेहत को लेकर भी उन्हें खूब परेशानी झेलनी पड़ी। जब दर्शकों ने दूसरी बार इसे देखा तो बॉक्स ऑफिस में जुटी भीड़ ने पिछली बार के तजुर्बे को नकार दिया। फिल्म का संगीत इतना लोकप्रिय हो गया था कि दर्शक न चाहते हुए भी गीत सुनने के लिए सिनेमा हॉल में पहुंचते थे। संगीत दिया था राजकपूर की पसंदीदा संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन ने। सोवियत संघ में इसे जब 1972 में रिलीज किया गया तो यह ब्लॉकबस्टर साबित हुई। 19वें फिल्मफेयर पर तो इस फिल्म की टीम ने लंबा हाथ मारा ही, तीन राष्ट्रीय पुरस्कार भी झटके। आपको याद है जिस स्कूल में ऋषि कपूर, सिम्मी से पढ़ते थे, वह क्रिश्चिन स्कूल राजकपूर का ही था और ऋषि कपूर का वह क्रश उनका खुद का एपिसोड था। राजकपूर ने तीसरा चैप्टर पहले फिल्माया, जो राजेंद्र कुमार और पद्मिनी का था क्योंकि वही डेट्स उन्हें उपलब्ध थीं। फिर उन्होंने पहला चैप्टर शूट किया था जो ओवर बजट के कारण नियत टाइम के बाद हुआ। इसका निर्देशन कमाल का था। स्टोरी ऐसे शुरू होती है कि जिन तीन महिलाओं को राजू ने जोकर दिये थे, उन्हीं तीनों महिलाओं को राज आमंत्रित करता है अपनी जिंदगी के 20 साल तक एक जोकर के रूप में सर्कस को देने के बाद फाइनल प्रस्तुति पर। इन्हीं तीन महिलाओं से इस राजू ने प्यार किया था और जिंदगी की ऊहापोह में उन्होंने भी उस जोकर को भुलाया नहीं लेकिन अपने सामाजिक रुतबे के कारण उन्होंने शादियां किसी और से कर लीं थी। फ्लैशबैक में चलती है फिल्म।

इसके चैप्टर देखते हैं-पहला चैप्टर : राजू अपनी मां के साथ रहता है बिल्कुल गुरबत में। पिता गुजर चुके हैं। किसी तरह राजू की मां उसे क्रिश्चियन स्कूल में पढ़ाती है। लेकिन उच्च समाज के बच्चे उसे जोकर कहकर छेड़ते हैं क्योंकि उसके पिता भी सर्कस में जोकर ही थे। लेकिन नयी क्लास टीचर (सिम्मी ) राजू (ऋषि) को खूब प्रोत्साहित करती है। मां के इनकार के बावजूद वह अपने पिता की तरह जोकर ही बनना चाहता है। राजू एक दिन स्कूल के ट्रिप पर जंगल में जाता है जहां सिम्मी ग्रेवाल को वह नग्नावस्था में देख लेता है। वह अपने गुनाह के लिए चर्च में कनफेस भी करता है मगर सिम्मी ग्रेवाल उसे कहती है कि चूंकि वह बच्चा है, इसलिए उसने कोई पाप नहीं किया, मगर किशोरावस्था का प्यार उसे विवश करता है कि वह टीचर को अपने प्रेम की भेंट स्वरूप जोकर देता है और एक लेटर जिसे सिम्मी का होने वाला पति मनोज कुमार देख लेता है। शादी के बाद मनोज कुमार राजू को भेंट स्वरूप वही जोकर देता है। यह पहली टूटन थी जो जीवन के पहले घंटे में उसे मिली थी। उसके बाद बीमार मां के इलाज के लिए जब उसे उसके सहपाठी फुटपाथ पर जोकर बेचते देख लेते हैं, उनकी शिकायत के फलस्वरूप राजू को स्कूल से निकाल देते हैं। फिर राजू बीमार मां के साथ बम्बई में जगह-जगह घूमता है। दूसरा चैप्टर : यहां राजू को जवां (राजकपूर) दिखाया गया है। वह स्थानीय मेलों में जोकर बनता है। तभी जैमिनी सर्कस को प्रमोट करने के लिए भारत-सोवियत संबंधों को प्रगाढ़ता प्रदान करने हेतु रूसी कलाकार आते हैं। वहां राजू घुस जाता है और पहली पगार बतौर रूसी रिंगलीडर ले भी लेता है। फलस्वरूप सर्कस का असली रिंग लीडर षड्यंत्र करता है। राजू बताता है कि वह यहां नौकरी की तलाश में आया था। इस पर सर्कस का मालिक महेंद्र (धर्मेंद्र) उसे जोकर की नौकरी पर रख लेता है। सर्कस की ही एक रूसी महिला कलाकार मरीना से राजू की दोस्ती हो जाती है। भाषा के बैरियर्स के बावजूद राजू मरीना को प्यार करने लगता है और मरीना भी। वह मरीना को मां से मिलाता है। मरीना राजू द्वारा दिया गया जोकर स्वीकार कर लेती है। मगर तभी स्वदेश वापसी की खबर सुनकर वह जोकर राजू को लौटा देती है और राजू दोबारा टूटता है। इसी बीच जोकर का कार्यक्रम करते उसकी मां की मृत्यु हो जाती है और वह दर्शकों को हंसाता रहता है। टूटे हुए दिल को लेकर राजू एक कुत्ते के साथ समुद्र तट पर खेलता रहता है। यह कुत्ता बेसहारा मीनू का है। एक दिन राजू को मीनू की फटी शर्ट दिख जाती है और पता चलता है कि वह लड़की है। वह अपना असली नाम मीना बताती है। बम्बई में हीरोइन बनने आयी मीना जमाने से बचने के लिए लड़के का रूप धरे रहती है। काफी रूठ-मनुहार के बाद मीना राजू के लिए अपना प्यार स्वीकार कर लेती है। दोनों को लवसॉन्ग गाते देख उन्हें कव्वाली का ठेका मिल जाता है। तभी राजेंद कुमार उसे अपनी नयी फिल्म में हीरोइन के रूप में अनुबंधित कर लेता है। मगर शर्त राजू को छोड़ने की रखता है। राजू मीना का साथ छोड़ पुरानी झुग्गी में लौट आता है। और इसी के साथ फ्लैशबैक खत्म। मगर राजू वादा करता है कि वह मध्यांतर के बाद फिर लौटैगा। तीसरा घंटा खत्म और फिल्म भी खत्म।

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