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भगवान ने दुष्टों के संहार के साथ किया मोक्षगामी – पं ऋषिकेश मिश्रा

भगवान ने दुष्टों के संहार के साथ किया मोक्षगामी – पं ऋषिकेश मिश्रा

  चित्तौडग़ढ़ हलचल।  भागवताचार्य पंडित ऋषिकेश मिश्रा ने कहा कि भगवान के चौबीस अवतारों में से प्रत्येक अवतार में उन्होंने दुष्टों का संहार कर उन्हें मोक्षगामी होने का वरदान देकर धन्य किया है। जिससे यह अनुभूति होती है कि वेदभाव से प्रभु का नाम स्मरण करने पर भी वे अपनी शरण में ले लेते है। पंडित मिश्रा रविवार को वेदपीठ परिसर में श्री कल्लाजी वेदपीठ एवं शोध संस्थान द्वारा श्रीमद् भागवत ज्ञान गंगा के षष्ठम चरण में षष्ठम दिवस पर व्यासपीठ संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कंस वध का विस्तार करते हुए कहा कि मथुरा के राजा कंस ने अक्रूर जी को कृष्ण बलराम को जब लाने भेजा तो अक्रूर जी काफी चिंतित हो गए। जब वे गोकुल व नन्दगांव पहुंचे तो मार्ग में उन्हें कृष्ण बलराम मिल गए। जिन्हें देखकर अक्रूरजी ने विचलित होकर कहा कि वे मथुरा ले जाने के लिए आए है, जहां कंस दूसरे दिन उनका वध करना चाहता है, तब श्री कृष्ण ने अक्रूरजी को विश्वास दिलाया कि कंस उन्हें नहीं मार सकता है, तब नन्द बाबा और यशोदा को समझाकर वे कृष्ण बलराम को जब मथुरा ले जाने लगे तो बड़ी संख्या में ग्वालबाल और गोपिया उनके साथ हो गए। मथुरा पहुंचने पर कृष्ण ने चाणुर व बलराम ने मुस्टीक को मार दिया। जिन्हें देखकर कंस भी गबरा गया, लेकिन आखिर कंस भी भगवान कृष्ण के हाथों मारा गया। उन्होंने श्री कृष्ण के विद्याध्ययन के लिए महर्षि संदीपनी के आश्रम जाने एवं वहां 64 कलाओं का ज्ञानार्जन का वर्णन किया। इसी आश्रम में सुदामा श्री कृष्ण के मित्र बने । एक समय सुदामा को एक माता द्वारा श्रापित चने दे दिए गए, जिनका मर्म समझकर सुदामा ने कृष्ण को देने के बजाय वे चने स्वयं ने खा लिए, जिसके कारण वे विपन्न हो गए। पंडित मिश्रा ने कृष्ण रूकमणि विवाह प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि राजा भिष्मक की पुत्री रूकमणि का विवाह वे श्रीकृष्ण से करवाना चाहते थे , लेकिन रूकमणि का भाई रूकमी उसका विवाह शिशुपाल से कराना चाहता था। उन्होंने बताया कि साक्षात लक्ष्मी स्वरूपा रूकमणि ने श्री कृष्ण को पत्र लिखकर अवगत कराया कि वे उनके गुणानुवाद सुनकर पति रूप में वरण कर चूकी है। उस पत्र को पाकर भगवान श्रीकृष्ण ने कात्यायनिय मंदिर से रूकमणि को रथ में ले जाकर द्वारिका में राक्षस विधि से विवाह कर नारी सम्मान के महत्व को प्रतिपादित किया। इसी दौरान पंडित प्रहलाद कृष्ण और साथियों ने कथा मंडप में अपने ही अंदाम में मंगलगीत की तान छेड़ दी। इस बीच वेदपीठ के पूर्व बटुक नवविवाहित सोनू नागदा व उसकी भार्या कृष्ण रूकमणि के रूप में मंडप में विराजित हुए। जिनका विधि वेदपीठ के बटुकों एवं आचार्यों के वैदिक मंत्रोच्चार के साथ वरमाला पहनाते हुए विधिवत विवाह समारोह आयोजित किया गया। इस दौरान गायक लोक कलाकारों ने मेवाड़ी अंदाज में बनो मारों चार भुजा रो नाथ, बनी मारी तुलसा लाड़ली सहित विवाह के कई भजनों से समूचे वातावरण भक्तिमय बनाते हुए द्वारिका निरूपित कर दिया। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु नर नारी भाव विभोर होकर नृत्य करते हुए श्रीकृष्ण रूकमणि को अपलक निहारते रहे। इस दौरान ठाकुर श्री कल्लाजी का मनभावन श्रृंगार भक्तों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहा। वहीं मंच से की गई पुष्प वर्षा से समूचा परिसर भिनी भिनी सुगंध से महक उठा। कथा के सप्तम दिवस सोमवार को मेत्री भाव के प्रतीक कृष्ण सुदामा चरित्र के साथ कथा का विराम होगा। प्रारंभ में वेदपीठ के न्यासियों, आचार्यों, बटुकों द्वारा व्यासपीठ एवं मुख्य यजमान ठाकुरजी पूजा अर्चना की। वहीं कथा विश्राम पर श्रद्धालुओं द्वारा महाआरती के पश्चात महाप्रसाद वितरित किया गया।

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