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देवता चाहते हुए भी संयम धारण नहीं कर सकते, केवल मनुष्य गति में ही धर्म को पूर्ण रूप से धारण करने की पात्रता मिलती है

 देवता चाहते हुए भी संयम धारण नहीं कर सकते, केवल मनुष्य गति में ही धर्म को पूर्ण रूप से धारण करने की पात्रता मिलती है

 भीलवाड़ा हलचल । सोमवार को विद्यासागर वाटिका में आयोजित समवशरण विधान पूजन में जिनके दर्शन मात्र से ही इन्द्रभूति का मान विलय हो गया एवं दीक्षा ग्रहण कर गौतम गणधर नाम से महावीर भगवान के प्रथम गणधर बने। ऐसे समवशरण के चारों दिशाओं में प्रवेश द्वार पर बने मान स्तम्भ में विराजमान जिन प्रतिमाओं की भक्ति भाव एवं श्रीफल चढ़ाकर पूजन की गई। इससे पूर्व शची, धनश्री एवं अन्य इन्द्राणियों ने समवशरण में मंगल कलशों की स्थापना की।

इस दौरान निर्यापक मुनि विद्यासागर महाराज ने प्रवचन में कहा कि मनुष्य जीवन बहुत दुर्लभ है, जो इस बात को समझ लेता है वह इसका उपयोग चंदन की लकड़ी के समान बहुमूल्य मानकर, संयम आदि धारण कर मुक्ति मार्ग के लिए करता है। जो मानव जीवन की दुर्लभता को नहीं समझ पाता है, वह चंदन की लकड़ी को भी कोयला बनाकर बेचने के समान कार्य करता है। देवता चाहते हुए भी संयम धारण नहीं कर सकते, केवल मनुष्य गति में ही धर्म को पूर्ण रूप से धारण करने की पात्रता मिलती है। क्योंकि देव गति में जीवन भोगों में, नरक गति में अवर्णनीय दुख भोगने में और तिर्यंच जीवन तो ज्ञान हीन ही होता है।

श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष नरेश गोधा ने बताया कि विधान के दौरान प्रातः 6.30 बजे से अभिषेक क्रिया में चैनसुख, आशीष, अंशुल शाह ने 108 रिद्धी मंत्र से अभिषेक किया, नरेश कुमार, प्रदीप लुहाडिया, पदमचंद सुरेश गदिया एवं महावीर पवन कुमार पहाड़िया ने शांतिधारा की। नौरतमल तारादेवी अजमेरा परिवार ने विद्यासागर महाराज ससंघ का पादपक्षालन किया। राकेश मोनिका पहाड़िया ने शास्त्र भैंट किये।