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जीवन के सभी पापों का जनक लोभ है: साध्वी विनितरूप

जीवन के सभी पापों का जनक लोभ है: साध्वी विनितरूप

आसींद हलचल। प्रभु महावीर ने कहा ज्यों-ज्यों लाभ होता है त्यों-त्यों लोभ और अधिक मात्रा में बढ़ता चला जाता है। आज तक जितने भी युद्ध -मन मुटाव -हिसा -अत्याचार या अनाचार हुए हैं उसके पीछे एक ही कारण लोभ का रहा है। इंसान की इच्छाएं अनंत होती हैं जो कदापि पूर्ण नहीं हो पाती। इंसान खाली हाथ आता है एवं एक दिन खाली हाथ ही प्रस्थान कर जाता है। लोभ तन का, मन का, धन का, कुटुम्ब कबिला, जमीन जायदाद का या पद प्रतिष्ठा का नानाभांति जीवन में प्रगट होता रहता है। मन में हजारों कल्पनाएं उभरती रहती है। प्रभु महावीर ने इस लोभ को जीतने के लिए संतोष का मार्ग बतलाया जैन श्रावकों के लिए परिग्रह परिणाम व्रत की व्याख्या की। वस्तुओं की मर्यादाओं से ही मन पर काबू पाया जा सकता है। राजा महाराजाओं के युद्ध इसी लोभ के चलते हुए हैं। खाने को कहा जाता है तो दो रोटी की जरूरत पड़ती है। फिर पता नहीं इंसान इतना लोभ में क्यों डूबा जा रहा है। कृपण व्यक्ति के पास लक्ष्मी आ भी जाए फिर भी वह इसका उपयोग नहीं कर पाता। कहावत है कीड़ी संचे तीतर खाये अर्थात संचय तो किड़िया करती जाती है खाने वाला कोई अन्य ही होता है। लोभ को पाप का बाप भी कहा जाता है। सारे पाप इसी के इर्द गिर्द घूमते रहते है।
उक्त विचार तपाचार्य श्री जयमाला की सुशिष्या साध्वी  विनित रूप प्रज्ञा ने धर्म सभा में व्यक्त किए
साध्वी  चंदन बाला जी ने कहा कि आज का मानव सब कुछ प्राप्त होने के उपरांत भी,कर्तव्यविहीन एवं कृतज्ञहीन हो गया है,उत्तम कुल,वीतराग धर्म,भारत जैसी देवभूमि,निरोगी काया,देव शास्त्र गुरु का सानिध्य,पर्याप्त धन-वैभव,संपत्ति,सम्मान,प्रतिष्ठा अर्थात अपार पुण्य से प्राप्त इस अनुकूलता को शुभ में प्रवृत्त होकर,पुण्य से पुण्य बढ़ाने में नहीं करता परिणाम यह होता है पुण्यहीन होते ही अरबपति से रोडपति बनने में देर नहीं लगती, प्राप्त अनुकूलता के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए,अपने उपयोग( समय) को देव दर्शन, पूजा विधान,नियम,संयम, तपस्यशरण साधना में व्यतीत करते हुए पुण्य से पुण्य बढ़ाना चाहिए हिंसा,झूठ,चोरी,कुशील एवं परिग्रह से निवृत्ति का मार्ग अपनाते हुए मन वचन काया की विशुद्धि के साथ भावों को निर्मल करने का सम्यक पुरुषार्थ करना चाहिए,इसी में मानव पर्याय की सार्थकता है और आत्मा का कल्याण निहित है,
पापों का विश्लेषण करने पर यह अनुभव में आता है कि मान, अहंकार एवं लोभ के कारण ही जीव सभी पाप करता है,मानव को अपनी मान कषाय एवं लोभ की प्रवृत्ति पर नियंत्रण लगाने की नितांत आवश्यकता है,अगर इन दो कषाय पर विजय प्राप्त कर ली जाती है तो अन्य दो कषाय क्रोध एवं मायाचारी जीव का अहित नहीं कर सकती,आगम में यह अंकित किया गया है कि मनुष्य पर्याय उसमें भी पुरुष,वीतराग जैनधर्म,सभी इंद्रियों की उपलब्धता,देव शास्त्र गुरु का पावन सानिध्य एवं अन्य भौतिक अनुकूलताएं अनंत पुण्य से प्राप्त होती हैं,अतः इनको व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए,इसका लाभ प्राप्त करते हुए आत्मा के उत्थान कल्याण की यात्रा को आगे बढ़ाना चाहिए..!
 हस्तरेखा विशेषज्ञ दिलीप  नहाटा का श्री संघ ने शाल व माल्यार्पण   स्वागत किया।

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