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अभी जीवन देखा ही नहीं और किसी की लापरवाही के चलते मौत की नींद सो गए

अभी जीवन देखा ही नहीं और किसी की लापरवाही के चलते मौत की नींद सो गए

महाराष्ट्र के अहमदनगर में हुए हादसे का जख्म अभी ताजा था कि भोपाल के एक अस्पताल में आग लगने से चार नवजात शिशुओं की मौत हो गई। वहां के हमीदिया अस्पताल में नवजात शिशु कक्ष में आग लगी, जिसमें चालीस बच्चे भर्ती थे। बताया जा रहा है कि देर रात को जब आग लगी, तो बच्चों को बचाने के बजाय ज्यादातर स्वास्थ्यकर्मी अपनी जान बचा कर भाग निकले। दूसरे रोगियों की तरह नवजात शिशु खुद जान बचाने का प्रयास भी नहीं कर सकते थे, इसलिए उनमें से चार को नहीं बचाया जा सका।

ऐसे विशेष कक्षों में उन्हीं नवजात शिशुओं को रखा जाता है, जिन्हें पैदा होने के साथ ही कोई समस्या होती है। उन्हें विशेष संयंत्रों के सहारे रखा जाता है। जाहिर है, यह कक्ष अत्यंत संवेदनशील होता है। मगर विचित्र है कि वहां भी बिजली आदि के मामले में इस कदर लापरवाही बरती जाती है कि कभी आग लगने से, तो कभी उन संयंत्रों के अचानक बंद हो जाने से शिशुओं की मौत हो जाती है, जिनके सहारे उनकी जीवन रक्षा करने का प्रयास किया जाता है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने इस घटना को आपराधिक किस्म का माना है। देखना है कि इस मामले में क्या कार्रवाई होती है।

 

चाहे वह बच्चों का कक्ष हो, कोविड मरीजों का या गहन चिकित्सा कक्ष, अस्पतालों के किसी भी हिस्से में बिजली की गड़बड़ी से आग लगने जैसी घटनाएं निस्संदेह व्यवस्था के लिए शर्म का विषय हैं। अस्पतालों में वही लोग भर्ती होते हैं, जिनका उपचार सामान्य तरीके से संभव नहीं होता। उनमें बहुत सारे लोग गंभीर हालत में होते हैं, कई के गंभीर आपरेशन हुए होते हैं, तो कई बेहोशी की हालत में होते हैं।

ऐसे में अगर बिजली की गड़बड़ी से उनकी जान चली जाए, तो इसे किसी भी रूप में क्षम्य नहीं माना जा सकता। मगर विचित्र है कि अस्पतालों में आग की घटनाओं को भी प्रशासन सामान्य लापरवाही या मानवीय चूक मान कर रफा-दफा कर देता है। नवजात शिशुओं का इस तरह दम तोड़ देना कितना दर्दनाक और अफसोसनाक है कि उन्होंने तो अभी जीवन देखा ही नहीं और किसी की लापरवाही के चलते मौत की नींद सो गए।

दरअसल, सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की दशा दिन पर दिन इसलिए भी खराब होती गई है कि सरकारें इन्हें लेकर गंभीर नहीं दिखाई देतीं। स्वास्थ्य पर खर्च को लेकर हर साल आंकड़े जारी किए जाते हैं कि किस तरह हम से गरीब देशों में भी इससे अधिक पैसा खर्च किया जाता है। फिर भी सरकारें कान में तेल डाले रहती हैं। उन्हें निजी अस्पतालों और स्वास्थ्य बीमा पर कुछ अधिक भरोसा है। मगर देश की बड़ी आबादी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं पर ही निर्भर है। इसे सुधारे बिना कोई भी सरकार कल्याणकारी सरकार नहीं कहला सकती।

मगर सरकारी अस्पतालों की हालत तो यह है कि वहां भरोसेमंद बिजली की व्यवस्था तक नहीं है। आजकल बिजली सुरक्षा के जितने आधुनिक उपकरण उपलब्ध हैं, उतने किसी और मामले में नहीं होंगे। फिर भी सरकारी अस्पतालों के मिस्त्री किस्म के बिजलीकर्मी पुराने उपकरणों में सुधार करके या जैसे-तैसे कामचलाऊ उपाय जुटा कर बिजली का प्रवाह चालू रखने का प्रयास करते हैं। बिजली से सुरक्षा के उपकरण लगाना बहुत खर्चीला काम भी नहीं है, मगर भ्रष्ट अधिकारी और कर्मचारी सुरक्षा के बजाय अपनी जेबों का ध्यान अधिक रखते हैं। असुरक्षित अस्पतालों के परिवेश के लिए वही जिम्मेदार हैं।

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