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मैंने सुना है कि ‘कोरोना’ को तो नेताओं से ‘डर’ लगता......!

मैंने सुना है कि ‘कोरोना’ को तो नेताओं से ‘डर’ लगता......!

 

लो जी, उसके आने की दस्तक हो गई। हमारे सारे चिकित्सा विज्ञानी चिल्लाने लगे हैं कि यह आई, वह आई। खैर! अब वह आ ही रही है तो आने दो! हम कोई उसे पीले चावल तो नहीं देने गए थे। अब बिन बुलाए मेहमान की तरह वह आने पर आमादा है तो आने दीजिए! हां, यदि उसे कोई भ्रम या गलतफहमी हो कि हमने उसे आमंत्रण दिया है या दे रहे हैं तो उसके भ्रम या गलतफहमी को दूर करें।

उससे मेरा तो यही कहना है कि हे कुलक्षिणी! पिछली बार जब तुम पहली और दूसरी का रूप धर कर आई थी तब भी हमने तुम्हें नहीं बुलाया था और अब भी नहीं बुला रहे हैं। ये जो तुम बैंड, बाजा, बारात देख कर भ्रमित हो रही हो कि हम नाच-गाना कर तुम्हें न्योत रहे हैं तो यह भ्रम जितनी जल्दी हो सके दूर कर लो। यह तो लॉकडाउन व कोरोना प्रतिबंधों में हमारे अंदर भरी ‘भड़ास’ निकलने की खुशी में हम ऐसा कर रहे हैं। गार्डनों में जमा हमारी भीड़ के पीछे भी हमारा 56 पकवानों के रसास्वादन का स्वार्थ है, तुम्हें न्योतने का कोई उपक्रम नहीं।

होटल-रेस्टोरेंट आदि में हमें सपरिवार या बड़ी संख्या में ईष्ट-मित्रों के साथ बैठा देखकर यदि तुम भ्रमित हो कि हम तुम्हारी प्रतीक्षा में बैठे हैं तो यह भ्रम भी दूर कर लो। वहां हम या तो बीवी-बच्चों की फरमाइश पर गए हुए हैं अथवा किसी का बर्थडे या एनिवर्सरी मनाने। ये जो सरकार ने रेल-बस का संचालन पूरी यात्री क्षमता के साथ करने की छूट दी है, वह भी तुम्हारे लिए नहीं है। भीड़ भरी रेल-बस में यात्री स्वयं मुंह से मुंह सटाकर, खड़े-खड़े सफर कर रहे हैं, तुम्हें कहां जगह मिलेगी भला?

बच्चों के स्कूलों की घंटी सुनकर यदि तुम्हे भ्रम हो गया हो कि स्कूल तुम्हारे स्वागत के लिए खोले गए हैं तो यह भ्रम भी अतिशीघ्र दूर कर लो। यह तो हमने बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई से होने वाली आंखों की सुरक्षा व घर बैठे-बैठे बोर हो गए बच्चों के ‘गेट टुगेदर’ के लिए किया है।

मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों व गिरिजाघरों में हम यदि बड़ी संख्या में इकट्ठा होकर सामूहिक प्रार्थना आदि कर रहे हैं तो वह इसलिए थोड़े ही न कि ‘हे भगवान, तीसरी लहर को भेज देना’ बल्कि देश-दुनिया व स्वयं की कुशलता की कामना के लिए कर रहे हैं।

शायद तुम्हें इन भीड़ भरी चुनावी सभाओं को देखकर भ्रम या गलतफहमी हो गई है कि हम ऐसा तुम्हारे मान-मनव्वल हेतु कर रहे हैं। यदि ऐसा है तो यह गलतफहमी भी तुम शीघ्रातिशीघ्र दूर कर लो। दरअसल यह सभाएं तो ‘जागरूक’ मतदाताओं की मान-मनव्वल के लिए की जा रही हैं और फिर मैंने सुना है कि ‘कोरोना’ को तो नेताओं से ‘डर’ लगता है। तो तुम वहां कैसे आ पाओगी?

हे दुखदात्री! उम्मीद करता हूं मेरी साफगोई से तुम्हारे सारे भ्रमों व गलतफहमी का निवारण हो गया होगा। अब बस इतना ही निवेदन है कि हमारी ‘आज़ादी’ में खलल डालने कृपया मत आओ!

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