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मठों की वेद और पौराणिक शास्त्रो के संरक्षण मे रही अहम भूमिका-प्रो. उमेश दास

मठों की वेद और पौराणिक शास्त्रो के संरक्षण मे रही अहम भूमिका-प्रो. उमेश दास

  चित्तौडग़ढ़ हलचल। नाथद्वारा से आये प्रो. उमेश दास ने अपने शोध पत्र के माध्यम से कहा कि हमारे प्राचीनतम मठों की वेद और पौराणिक शास्त्रो के साथ ही दर्शन शास्त्र के संरक्षण मे अहम भूमिका रही है। अगर मठ नहीं होते तो शास्त्रो का अध्ययन और अध्यापन दुरूह हो जाता। प्रो उमेश दास श्री कल्लाजी वेदिक विश्वविद्यालय एवं भारतीय दर्शन अनुसध्ंाान परिषद शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार के संयुक्त तत्वाधान मे वैदिक विश्वविद्यालय सभागार मे भारतीय दर्शन के लिए हिंदु मठों के योगदान विषयक तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के द्वितीय दिवस के प्रथम सत्र मे संबांेधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि बटुकों को उपनयन संस्कार के उपरांत ही प्राचीनकाल मे मठ वेदाध्ययन के लिए गुरू की शरण मे भेजा जाता था। जैसा कि संहिता ब्राम्हण अरण्यक उपनिषद आदि ग्रंथों मे आश्रम व्यवस्था बताई गई है। उस अनुरूप मठ परंपरा मे शंकराचार्य, वैष्णव आचार्य, माधवाचार्य आदि आचार्यों का स्मरण करना अनिवार्य है। इस सत्र की अध्यक्षता कुरूक्षेत्र से आये प्रो सुरेंद्र मोहन मिश्र ने की। कर्नाटक से डां विजय श्रीनाथ कांची ने विचार व्यक्त करते हुए ब्राम्हण संहिता मे निहित चिन्हों के बारे मे बताया जो कि स्वयंभू है इस पर कुछ लिपि मे उत्कीर्ण स्थान भी है एवं मठों की परंपरा से ही भारतीय सास्कृतिक धरोहर सुरक्षित रही है। डां विदुषी आमेटा ने बताया कि भीलवाडा के दांतडा गांव मे एक मठ स्थापित है जो न केवल राजस्थान बल्कि संपूर्ण देश के लिए गौरव है और यह मठ राजस्थान के प्राचीनकाल मे भी मठो का केंद्र रहा है। जयपुर से आये निंबार्क संप्रदाय के प्रो रामस्वरूप गौड ने कहा कि शंकराचार्य से भी पहले देश मे निंबार्काचार्य की पंरपरा विद्यमान थी। उन्होनंे निंबार्काचार्य की जीवनी पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस संप्रदाय की पंरपरा को अध्यावधि जीवंत रखा हुआ है। उन्होंने परा और अपराध के भेद बताते हुए कहा कि ईश्वरीय प्रकृति और विकृति मंत्र आज भी शाश्वत है। सागवाडा से आये डां संतोष कुमार द्विवेदी ने मठों से वेदों का संबंध बताते हुए बताया कि मठों के पीठाधीश्वर पौराणिक ग्रंथों के संरक्षण के अधिष्ठाता रहे है। जिनके द्वारा वेदाध्ययन और ज्ञानार्जन के साथ कई रचनाए दी गई है। उन्होने विशेष रूप से कांची मठ पर विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया।
मीरा भक्ति साधना का अप्रतीम पुंज - प्रो समदानी
संगोष्ठी के द्वितीय सत्र मे प्रो एस एन समदानी ने भक्त शिरोमणी मीरा पर शोध परख व्यक्तव्य देते हुए कहा कि मीरा की भक्ति साधना दर्शन का अप्रतीम पुंज रहा है। उन्होने कहा कि भक्त शिरोमणी मीरा ऐसी संत थी जिन्होनंे अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त करते हुए अलग ही अस्तित्व साबित कर दिया। उन्होंने कहा कि प्रायः भारतीय समाज मे पति को परमेश्वर मानने की परंपरा है लेकिन भक्तिमति मीरा ने परमेश्वर को पति मानकर एक नया दर्शन देते हुए समाज को ईश्वर के प्रति समर्पित होने का संदेश दिया। उन्होंने बताया कि शब्द वाणी वैष्णवी समाज का पवित्र ग्रंथ है उन्होने भगवान के अवतारो से भी गुरू जांभोजी का संबंध स्थपित किया।  मेलुकोटे बेंगलुर के डां एम ए अलवार ने अपने ज्ञानप्रद व्याख्यान मे मठ शब्द का अमरकोष के अनुसार व्युतपत्ति स्पष्ट किया। उन्होने कहा कि जहां विद्याध्ययन होता रहा और छात्र बसते रहे वही मठ के रूप मे ख्याति प्राप्त हुआ। उन्होनंे मठो द्वारा दी गई दिशा सिद्धांत संप्रदाय और पंरंपरा को बखानते हुए मठ परंपरा पर विस्तार से प्रकाश डाला। प्रारंभ मे आगंतुक अतिथियों शोधकर्ताओं एवं विद्यार्थियों ने वैदिक विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता ठाकुर श्री कल्लाजी एवं ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा अर्चना की। संगोष्ठी मे कार्यक्रम संयोजक एवं महर्षि भारद्वाज अनुसंधान के निदेशक डां दिलीप कुमार कर ने भारतीय दर्शन के लिए हिंदु मठों के योगदान विषय के विस्तार से जानकारी दी। वही कुल सचिव डां मधुसूदन शर्मा ने आगंतुक अतिथियों का स्वागत किया। इस मौके पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रों लक्ष्मी शर्मा, वेदांग ज्योतिष विभागाध्यक्ष डां मृत्युजंय कुमार तिवारी, संस्कृत विभागाध्यक्ष डां स्मिता शर्मा, ग्रंथालय विभागाध्यक्ष डाॅ अश्विनी यादव, योग विभागध्यक्ष जसबीर शास्त्री, वेद विभागध्यक्ष प्रों दीपक पालीवाल, वेद विद्यालय के बटुक, वेदपीठ के न्यासी सहित कई विद्वजन उपस्थित थे।
वैदिक विश्वविद्यालय वर्तमान वैदिक शिक्षा का प्रमुख ज्ञानकेंद्र होगा
इस मौके पर देश के विभिन्न क्षेत्रों से आये विद्वानों और अतिथियों ने वैदिक विश्वविद्यालय परिसर का अवलोकन करते हुए कहा कि नालंदा और तक्षशीला की तर्ज पर स्थापित हो रहे इस विश्वविद्यालय को वैदिक शिक्षा का आधुनिक केंद्र एवं विश्व के वैदिक मानचित्र पर अपनी अलग पहचान बनाने वाला ज्ञानकेंद्र निरूपित किया। जहां वेद विद्यालय के साथ ही वैदिक विश्वविद्यालय व गौशाला संचालन संयुक्त रूप से हो रहा है। विद्वानों का मानना था कि यह पवित्र स्थान आने वाले समय मे देश दुनिया के लोगो को ज्ञानार्जन के लिए आकर्षित करने मे अपनी अहम भूमिका निभायेगा। 

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