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मुफ्त की रेवड़ियां बांटने से भारत हो जाएगा तबाह..!

मुफ्त की रेवड़ियां बांटने से भारत हो जाएगा तबाह..!


आम चुनाव विशेषकर विधानसभा चुनावों में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा यदि मुफ्त की रेवड़ियां बांटने संबंधी घोषणाओं पर रोक नहीं लगाई गई तो भारत को भी श्रीलंका जैसी आर्थिक अराजकता का सामना करना पड़ सकता है ।
यहां गौरतलब बात यह है कि विगत 16 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सभा को संबोधित करते हुए  चुनाव में मुफ्त की रेवड़ियां बांटने संबंधी घोषणा को बेहद गंभीर विषय बताया था । उनके बाद सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एन. वी. रमन्ना ने भी ऐसी घोषणाओं को देशहित में नहीं बताते हुए कहा कि ये स्वस्थ लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा है ।
अप्रत्यक्ष रूप से मतदाताओं को खरीदने के लिए की जाने वाली इन मुफ्त की घोषणाओं पर रोक लगाने के लिए 22 जनवरी , 2022  को सुप्रीम कोर्ट में अश्विनी उपाध्याय ने एक जनहित याचिका दायर की है । इस याचिका की सुनवाई के दौरान बहुत ही रोचक तथ्य व आंकड़ा यह सामने आया कि पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी द्वारा की गई मुफ्त चुनावी घोषणाओं को यदि पूरा किया जाता है तो प्रतिमाह 12 हजार करोड़ रुपए की आवश्यकता पड़ेगी जबकि इस राज्य से किया जाने वाला जीएसटी कलेक्शन मात्र 1400 करोड़ रुपए ही है । इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि असल में इन घोषणाओं पर अमल करना संभव ही नहीं है और यदि येन - केन - प्रकारेण ऐसा किया जाता है तो राज्य की अर्थव्यवस्था तबाह होने में तनिक भी देर नहीं लगेगी । लिहाजा इस बात की गंभीरता को समझते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से इस पर जवाब देने को कहा । आयोग ने चुनाव से पूर्व की जाने वाली मुफ्त की घोषणाओं को राजनितिक दलों का नीतिगत निर्णय बताते हुए इस पर किसी भी प्रकार की रोक लगाने में अपनी असमर्थता व्यक्त की । इस पर सुप्रीम कोर्ट ने जब केंद्र सरकार का पक्ष जानना चाहा तो उनके प्रतिनिधि ने भी चुनाव पूर्व की जाने वाली मुफ्त की घोषणा को एक गंभीर विषय बताते हुए कहा कि चुनाव आयोग को इस संबंध में कोई ठोस निर्णय लेना चाहिए । 
यहां गौरतलब बात यह है कि कोई भी राजनीतिक दल यह हरगिज नहीं चाहेगा कि मतदाताओं को अपने पक्ष में करने वाली मुफ्त की घोषणाओं पर कोई रोक लगे । ऐसे में आगामी 11 अगस्त को होने वाली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ही चुनाव आयोग , केंद्र सरकार , नीति आयोग , वित्त मंत्रालय और अन्य संबंधित विभागों को पाबंद करके इस बारे में कोई ठोस निर्णय ले ताकि चुनाव पूर्व की जाने वाली घोषणाओं पर रोक लग सके । यदि ऐसा नहीं किया गया तो टैक्स के रूप में दी जाने वाली आम जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा राजनैतिक दल अपनी सरकार बनने पर व्यर्थ ही लुटाते रहेंगे । जिससे विकास कार्य तो बाधित होंगे ही , साथ ही आर्थिक रुप से तबाह होने का खतरा भी मंडराने लगेगा ।