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पहले फिजूल योजनाएं बनाओ, सरकार बदलते ही भूल जाओ

पहले फिजूल योजनाएं बनाओ, सरकार बदलते ही भूल जाओ

युवाओं के रोजगार और शैक्षिक कल्याण की योजनाएं सत्ता परिवर्तन के साथ 'दम तोड़ रही हैं। भाजपा और कांग्रेस राज में कई योजनाएं शुरू हुई, लेकिन राज बदलने के साथ गुम हो गई। 20 प्रतिशत युवाओं को भी पिछले दस साल में योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाया है।

साल 2010 से 2020 की बात करें तो इस दौरान एक बार भाजपा और दूसरी बार कांग्रेस सरकार बनी है। पिछले एक दशक में उच्च शिक्षा विभाग ने कॉलेज में अध्ययनरत युवाओं के रोजगार, शैक्षिक उन्नयन और कॅरियर को लेकर कई योजनाएं बनाई। जोर-शोर से इन्हें राज्य के महाविद्यालयों में लागू किया गया। दुर्भाग्य से अधिकांश योजनाएं कामयाबी से पहले ही हांफ गई। इसके पीछे सत्ता परिवर्तन सबसे बड़ी वजह बनी है।

देखिए रोजगोरोन्मुखी कार्यक्रमों का हाल
-एसएफएस योजना के तहत निजी अथवा सरकारी नौकरी, व्यवसाय और विभिन्न कारणों से पढ़ाई से वंचित विद्यार्थियों को नियमित प्रवेश सायंकालीन कक्षाएं प्रारंभ करना तय हुआ। विद्यार्थियों ने दस हजार रुपए फीस देखकर कदम भी नहीं बढ़ाए
-इग्नू के सहयोग से खोले गए उद्यमिता एवं कौशल विकास पाठ्यक्रम भी ज्यादा सफल नहीं हुए। राज्य के कॉलेज में गिने-चुने कोर्स में विद्यार्थियों ने प्रवेश लिए हैं।
-एक निजी बैंक से एमओयू कर सभी कॉलेज में ट्रेनिंग-प्लेसमेंट केंद्र खोले गए। इनमें बैंक परीक्षाओं की तैयारी कराई जानी थी। दस साल से केंद्रों का अता-पता नहीं है।
-मुख्यमंत्री छात्रवृत्ति योजना (सत्र 2020-21 में विद्यार्थियों को प्रमोट करने से स्थगित)

फेल हुई खास योजनाएं (दस साल में)
-2016-17: 75 फीसदी से ज्यादा उपस्थिति पर परीक्षा में 5 अतिरिक्त अंक (कागजों में)
-2011-12 : सभी कॉलेज में मिलिट्री साइंस पाठ्यक्रम की शुरुआत (कागजों में)
-2017-18: रक्तदान करने पर 5 अतिरिक्त उपस्थिति का लाभ (कागजों में)
-2012-13: कैट और लघु सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम (बंद)
-2007-08: इंग्लिश स्पोकन लैब और जेनपेक्ट सेंटर (बंद)
-2008-09: कॉलेज में हाइटेक कम्प्यूटर लेब और फैसेलिटी सेंटर (बंद)

फैक्ट फाइल
राज्य में सरकारी कॉलेज-328
निजी कॉलेज-1852
सरकारी विश्वविद्यालय-27
निजी विश्वविद्यालय-51
राज्य में अध्ययनरत विद्यार्थी-12.50 लाख
अध्ययनरत छात्र-6.50 लाख
अध्ययनरत छात्राएं-6.00 लाख


उच्च शिक्षा विभाग नियमित रूप से योजनाएं चलाता हैं। एक दशक में वैश्विक मंदी, कोरोना संक्रमण जैसी कई चुनौतियां भी आई हैं। सत्ता परिवर्तन के बावजूद कई योजनाएं जारी हैं, लेकिन यह विद्यार्थियों के रुझान पर निर्भर करती हैं। योजनाएं बंद करने का कारण युवाओं की अरुचि, क्षेत्रीय जरूरत नहीं होना जैसे कारण हो सकते हैं।

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