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कभी ना भूले माता-पिता और गुरु का उपकार - आचार्य महाश्रमण

कभी ना भूले माता-पिता और गुरु का उपकार - आचार्य महाश्रमण

भीलवाड़ा (हलचल)। तेरापंथ धर्म संघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, अनंत शक्ति के स्रोत आचार्य श्री महाश्रमण जी के सान्निध्य में नवरात्रि में अष्ट दिवसीय आध्यात्मिक अनुष्ठान जप, स्वाध्याय और मंत्रोच्चार सुनियोजित रूप से चल रहा है। आचार्यश्री के श्रीमुख द्वारा जैनागम ठाणं आधारित प्रवचनमाला के श्रवण से श्रोतागण नित नवीन तत्त्व का ज्ञान प्राप्त कर रहे है।

धर्मसभा में अमृत देशना देते हुए गुरूदेव ने कहा- पुत्र वह होता है जो अपने कुल की परंपरा ,मर्यादा की रक्षा करता है। आगम शास्त्र में पुत्र के दस प्रकार बताए गए है - आत्मज जो अपने पिता से पैदा होता है। क्षेत्रज - जो नियोग विधि से पैदा होता है, दत्तक - जो गोद लिया होता है, विज्ञक - विद्या शिष्य पुत्र, औरस - हृदय में अपार स्नेह भावना से किसी को पुत्र मान लेना, मौखर - वाक पटुता के कारण किसी को पुत्र मानना, समवीर - वीरता के कारण पुत्र मानना, समृद्धित - पालना पोषणा के कारण पुत्र मानना, अवोप्याचित - देवता की आराधना से पुत्र प्राप्त होना, धर्मांतेवासी - धर्म के कारण पुत्र मानना आदि। मूल पुत्र एक ही होता है जो पिता से उत्पन्न होता है परंतु विभिन्न संदर्भों में पुत्र के  उपरोक्त कई प्रकार हो जाते है।

आचार्यवर ने आगे फरमाया कि  पिता और पुत्र का एक दूसरे के प्रति कर्तव्य और दायित्व होता है। पुत्र होता है तो कुल की परंपरा आगे से आगे चलती रहती है। पिता का कर्तव्य है वह अपने पुत्र को शिक्षित, योग्य और संस्कारित बनाए, आर्थिक अर्जन आदि में भी पुत्र सक्षम बन सके। उसी प्रकार पुत्र का कर्तव्य है कि वृद्धावस्था में अपने अभिभावकों की सेवा करे। संसार में माता-पिता, धर्म गुरु और व्यापारी जिन्होंने मुश्किल दौर में आर्थिक सहयोग प्रदान किया, इन तीनों का उपकार कभी नहीं भूलना चाहिए। व्यक्ति को इनके प्रति हृदय में कृतज्ञता की भावना रखनी चाहिए। दुनिया में अनेकों महापुरुष हुए है जिन्होंने मां के प्रति सदैव विनय भाव रखा। कोई व्यक्ति कितना ही बड़ा बन जाए पर मां के लिए  वह बेटा ही होता है। अभिभावक व संतान दोनों धर्म की दृष्टि से एक दूसरे का सहयोग करते हुए आगे बढ़े यही काम्य है।

असाधारण साध्वी प्रमुखाश्री कनकप्रभा जी ने मंगल प्रेरणा देते हुए कहा कि व्यक्ति अपने जीवन में कोई लक्ष्य निर्धारण करे उसके लिए जरूरी है लक्ष्य के प्रति  सकारात्मक चिंतन। लक्ष्य छोटा हो या बड़ा उसके पीछे उद्देश्य अच्छा हो, लक्ष्य प्रैक्टिकल हो, उसमे लचीलापन हो। मार्ग में अनेक रूकावटे आने पर भी व्यक्ति का उत्साह कम न हो, कोई भी निमित्त से घबराए नहीं। अपितु लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में आगे  बढ़ते हुए अपने जीवन को प्रशस्त और सार्थक बनाने का प्रयास करे।

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