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चलने लगे है नोटिस के नश्तर,परिषद में घमासान , गलियारे सुनसान

चलने लगे है नोटिस के नश्तर,परिषद में घमासान , गलियारे सुनसान


       
भीलवाड़ा। नगर परिषद में इन दिनों *नोटिस नोटिस* का *खेल* चल रहा है। पहले *आयुक्त दुर्गा कुमारी* को *नोटिस* मिलते थे। अब *आयुक्त साहिबा* नोटिस दे रही है। आयुक्त दुर्गा कुमारी को समय पर *काम नहीं करने* और *सवालों का जवाब* समय पर नहीं देने पर *एसडीएम साहेब* *तलब* करते रहे है।*अबकी बार*  खुद *आयुक्त साहिबा* ने * नोटिसों * का ढेर लगाया है। करीब डेढ़ दर्जन कर्मचारियों को नोटिस थमाए है। अब दफ़्तर की *मुखिया* वो ही है। कार्यालय उन्हें ही चलाना है। तो लगा होगा कि *मातहत* तरीके से काम नहीं कर रहे या *यूं कहे वो जैसे चाहती है वैसे नहीं कर रहे*। तो *नोटिस को हथियार* बना लिया ताकि *जरूरत* पड़ने पर *ज्यादा सख्ती* की जा सके। *नोटिसों के तीर* से *हड़कंप* तो है। जिनको मिले है उनकी पीड़ा कोई नहीं समझ रहा। *परिषद में राज भले ही भाजपा का हो* लेकिन राज्य में *सरकार कांग्रेस* की है।उस पर *नेताजी के हुक्म* भी बजाने है। खैर सत्ता के खेल में नोटिसबाज़ी भी *एक हथियार* ही है। वैसे इन *नोटिसों* से *कई पुराने चावल* भी हैरान है। राज आता- जाता रहता है लेकिन पहली बार नोटिसों के तीर इस कदर चले है कि *न सहे जाते है न निकाले जाते*।
 अब आयुक्त साहिबा ने नोटिस जारी कर साफ़ साफ कह दिया हैं *सुधर जाओ* वरना *खैर नहीं। *तैयार रहो* 17 सीसी का नोटिस *झेलने* के लिए। अब नोटिस का दंश झेलने बाबू और अधिकारी दुविधा में हैं करें तो क्या करें।
मजे की बात तो यह हैं कि आयुक्त साहिबा ने नोटिस जारी कर यह तो कह दिया सुधार कर लो अपनी कार्यशैली में। लेकिन यह नहीं बताया कि कितने दिनों में सुधरना हैं। पांच दिन,दस दिन, एक महीना या फिर एक साल।  या फिर यह नोटिस *केवल दिखावा* हैं या *टेरर* बनाएं रखना हैं । आयुक्त साहिबा अपने उच्च अधिकारियों को बताना चाहती हैं कि देखो मैंने अपनी   *भवै तान* ली हैं।
अब आयुक्त साहिबा किसका हुकुम बजाएं। राज्य के  *स्वायत शासन मंत्री* या फिर भाजपा के *सभापति*  का। जिन लोगों को नोटिस दिया हैं उनमें कुछ  कांग्रेस मानसिकता वाले कर्मचारी हैं। उन्हें *अखर* रहा हैं कि उनके राज में उन्हें ही *नोटिस का तमका* दिया जा रहा। आयुक्त साहिबा ने नोटिस तो टिका दिए हैं। उनकी इस  स्थिति  पर एक फिल्म का गाना फिट बैठ रहा हैं वो हैं *मैं  इधर जाऊं या उधर जाऊं बड़ी मुश्किल में हूं मैं किधर जाऊं।* परिषद का हाल यह हैं कि आदमी कम और काम ज्यादा हैं। जानकारी मिली हैं अधिकांश सफाई कर्मचारियों को उनके मूल कार्य से हटा कर उनसे अन्य कार्य लिया जा रहा हैं।
 इन नोटिसों के बारे में आयुक्त साहिबा का पक्ष जानने के लिए उनके मोबाइल नम्बर *94616-74850* पर गुरुवार को दोपहर सवा चार बजे काॅल किया, लेकिन पांच मिनट तक घंटी जाने के बाद भी कोई उत्तर  नहीं मिला। आयुक्त साहिबा से मैं केवल और केवल यहीं जानना चाहता था कि जिनको नोटिस दिए हैं उन्हें कितने दिन में जवाब देना हैं और इसके बाद भी उन्होंने अपनी कार्यशैली नहीं सुधारी तो आयुक्त साहिबा ,*अगला कदम* क्या उठाएंगी। अब देखना हैं कि आगे क्या होता हैं। यह नोटिस भी परिषद की अन्य फाइलों की तरह *लाल बस्ते* में बंद होकर परिषद के *किसी कक्ष के कोने की शोभा तो नहीं बन जाएंगे।