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एक संकल्प ओर किसी के भी गले न पड़ने का

एक संकल्प ओर किसी के भी गले न पड़ने का

 

नया साल कैलेंडर में बदल गया था, वैसे ही जैसे फाइलों में देश। लेकिन दिन को उजाला नसीब नहीं हुआ था। वैसे ही जैसे देश के कई घरों को बिजली। कोहरे ने सूरज को ऐसे ढक रखा था जैसे राष्ट्रीय नेता के पोस्टर को छुटभइया नेताओं का फोटो। चारों तरफ नये साल की ख़ुशी से ज्यादा धुंध और शराब की बोतलें फैली हुई थी। धुंध में नया साल कहीं दिख ही नहीं रहा था। हमारे पुन्नीलाल बड़े भोर से उठ गए नये साल से गले मिलने। नया साल तो मिला नहीं, कचरा फेंकने जा रहे हम उन्हें मिल गए। देखते ही न जाने क्यों उन्हें मेरे मुखमंडल में नया साल नज़र आया और मेरे ही गले पड़ गए।

बधाई की इस जबरन आदान-प्रदान की क्रिया के बाद हम नित्यक्रिया हेतु जाने लगे तभी पुन्नीलाल धुंध को अपनी केसर युक्त पिचकारी से लाल वर्ण करते हुए बोले- गुरु, तो और क्या संकल्प लिए नये साल में, क्या रेसोल्यूशन बनाए? हम कहे ‘बच के रहना’ ही हमारा संकल्प है। पुन्नी सकपका के कनटोप उतार के बोले, गुरु ये कैसा संकल्प हुआ। मैंने कहा, हां भई, कोरोना के बदलते रूपों से बच के रहना और जिन्दा बचे रहना यही संकल्प लिया। बच के रहना सभी ब्लैक-येलो फंगस, डेल्टा-ओमीक्रोन से। बचे रहना सभी जानलेवा संक्रमणों से, गत दो सालों से यही एक संकल्प चल रहा है।

पुन्नीलाल बोले, बहुत मजबूत संकल्प ले लिए हो। हम कहे, जितनी कमज़ोर हमारी स्वास्थ्य सेवाएं हैं उसमें ज़िंदा रहने के लिए मजबूत संकल्प ही सहारा है। अगर संकल्प ही स्वास्थ्य सेवाओं जैसा ले लिया तो साल पूरा होने से पहले हम ही पूरे हो जायेंगे और संकल्प इस धरा में ही धरा रहा जायेगा। पुन्नीलाल ने पुनः प्रश्न किया ‘अगर इन प्राणघातक बीमारियों से बच गए तब क्या कोई नया संकल्प लोगे? मैंने कहा संकल्प तब भी यही होगा ‘बच के रहना’। बच के रहना घूसख़ोर पुलिसवालों से, बेईमान सरकारों से, नोट वाले शिक्षकों से, वोट वाले भिक्षकों से, ढोंगी बाबाओं से, धर्म के आकाओं से, सरकारी आंकड़ों की सच्चाई से, नेताओं की अच्छाई से, व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ज्ञान से, फेक न्यूज़ के सामान से। अगर इन सब से बच गए तो दोगले रिश्तेदारों से, उधार के व्यापारों से, जलनखोर मित्रों से, भड़कीले चित्रों से। वैसे बचना तो चाहते हैं जेब काटती महंगाई से, रोज़ बढ़ते दामों से, किचन के बिगड़ते बजट से, थाली से गायब होते घी-टमाटर, मटर से, लेकिन सरकार वो अपने बस में नहीं है।’

पुन्नीलाल थोड़ा ठिठक के बोले, अच्छा है, हम भी इनसे बच के रहने का संकल्प लिस्ट में जोड़ लेते हैं। अब विदा की वेला में वो जैसे ही गले मिलने के लिए बढ़े मैंने कह दिया कि एक संकल्प और जोड़ लो। किसी के भी गले न पड़ने का। आज के समय में बड़ा हानिकारक है।

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