boltBREAKING NEWS
  • भीलवाड़ा हलचल के नाम पर किसी को जबरन विज्ञापन नहीं दें और धमकाने पर सीधे पुलिस से संपर्क करें
  •  
  •  

ओलंपिक का ऐसा जुनून, इस पहलवान ने मकान तक रख दी गिरवी, फिर देश को दिलाया पहला मेडल

ओलंपिक का ऐसा जुनून, इस पहलवान ने मकान तक रख दी गिरवी, फिर देश को दिलाया पहला मेडल

टोक्यो ओलंपिक 2020 (Tokyo Olympics 2020 ) शुरू होने में अब चंद दिन बचे हुए हैं. 23 जुलाई से 8 अगस्त तक चलने वाले ओलंपिक के लिए 17 जुलाई को भारत का पहला दल टोक्यो के लिए रवाना होगा. इस बीच भारत के एक महान ओलंपिक खिलाड़ी की चर्चा तेज हो गयी है. पहलवान परिवार में जन्मे खाशाबा दादासाहेब जाधव  स्वतंत्र भारत के पहले ओलंपिक पदक विजेता खिलाड़ी हैं.लेकिन उस पहलवान खिलाड़ी की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वो ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर सके. उसके बावजूद ओलंपिक में न केवल हिस्सा लिया, बल्कि भारत को पहला मेडल भी दिलाया.मीडिया रिपोर्ट के अनुसार हेलसिंकी ओलिंपिक में भाग लेने के लिए खाशाबा दादासाहेब जाधव (Khashaba Dadasaheb Jadhav) लोगों के घर-घर जाकर पैसे मांगे. उनमें ओलंपिक खेलने का ऐसा जुनून सवार हुआ कि अपना मकान भी गिरवी रख दिया.

 स्वतंत्र भारत के पहले एथलीट जिसने ओलंपिक में जीता मेडल

पॉकेट डायनेमो (Pocket Dynamo) उपनाम से मशहूर खाशाबा दादासाहेब जाधव स्वतंत्र भारत के पहले एथलीट हैं, जिसने भारत को ओलंपिक में मेडल दिलाया. खाशाबा दादासाहेब जाधव ने 1952 में व्यक्तिगत स्पर्धा 54 किलोग्राम वर्ग में कांस्य पदक जीता. हालांकि इससे पहले 1948 लंदन ओलंपिक में वो मेडल जीतने में कामयाब नहीं हो पाये थे.

ओलंपिक में तिरंगा लहराने का लिया था प्रण

बताया जाता है कि खाशाबा दादासाहेब जाधव ने ओलंपिक में तिरंगा लहराने का प्रण लिया था. 15 जनवरी 1926 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के गोलेश्वर में जन्मे खाशाबा दादासाहेब जाधव को उनके पिता दादासाहेब जाधव ने 5 साल में ही फ्रीस्टाइल कुश्ती सीखने के लिए भेज दिया था. बताया जाता है कि उन्होंने महज 8 साल की उम्र में एक धाकड़ पहलवान को केवल दो मिनट में धूल चटा दिया था. उसके बाद जब और बड़े हुए तो आजादी की लड़ाई में कूद पड़े. देश आजाद हुआ और उन्होंने ओलंपिक में तिरंगा लहराने का प्रण लिया. अपने प्रण को पूरा करने के लिए उन्होंने अपना सबकुछ झोंक दिया.

अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित

खाशाबा दादासाहेब जाधव को कई पुरस्कारों से भी सम्मानित भी किया गया. उन्हें 2001 में मरणोपरांत अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया.