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दुनिया में इतने प्रतिशत लोग कर रहे मानसिक स्वास्थ्य की परेशानी का सामना

दुनिया में इतने प्रतिशत लोग कर रहे मानसिक स्वास्थ्य की परेशानी का सामना

नई दिल्ली। कोरोना ने आम आदमी को एक तरफ जहां शारीरिक प्रताड़ना दी है तो दूसरी तरफ लोगों में अकेलापन, अवसाद से तनाव, बैचेनी और डिप्रेशन जैसी शिकायत बढ़ी है। स्टेटिस्टा द्वारा किए गए सर्वे में सामने आया है कि दुनिया भर में लोगों का कोरोना के कारण मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ाया है।

स्टेटिस्टा के सर्वे में सामने आया कि अमेरिका में 42 फीसद लोगों ने माना कि वह मानसिक स्वास्थ्य की समस्या का सामना कर रहे हैं जबकि स्वीडन में 46 फीसद लोगों ने माना कि उन्हें डिप्रेशन और तनाव की शिकायत है। भारत में 28 फीसद लोगों का ऐसा मानना था कि कोरोना के दौर में उनका मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ाया है। ब्राजील में मानसिक सेहत खराब होने की बात को 40 प्रतिशत लोगों ने माना है तो जर्मनी में 31 फीसद लोग इस बात से इत्तेफाक रखते हैं।

स्टेटिस्टा ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है कि यह आंकड़ा इससे अधिक हो सकता है क्योंकि बहुत से लोग जहां मानसिक स्वास्थ्य खराब होने की बात को स्वीकारना नहीं चाहते तो कई लोग को इस बात का इल्म ही नहीं होता कि वह इस समस्या का सामना कर रहे हैं।

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तनाव से प्रभावित हुई लोगों की नींद

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), ऋषिकेश और देश के अन्य 25 चिकित्सा संस्थानों के एक अध्ययन में सामने आया था कि कोरोना की वजह से लोगों की नींद बुरी तरह से प्रभावित हुई है और क्वालिटी नींद में कमी आई है। रिपोर्ट के अनुसार, हेल्थ प्रोफेशनल को छोड़कर सभी पेशेवरों के साथ यह हो रहा है। नींद में आ रही कमी या स्लीपिंग पैटर्न में हुए बदलाव से लोग हताश हो रहे हैं। अध्ययन करने वाले डॉ रवि गुप्ता ने कहा कि अध्ययन में सामने आया कि सोने के बाद भी लोग तरोताजा नहीं हो रहे हैं। अध्ययन में यह भी सामने आया कि नींद नहीं पूरी होने की वजह से पहले जहां 26 फीसदी लोग हताश थे, यह प्रतिशत लॉकडाउन के बाद 48 हो गया। लॉकडाउन के पहले जहां नींद के कारण 19 फीसदी लोगों को बेचैनी की शिकायत थी, तो लॉकडाउन के बाद यह शिकायत 47 प्रतिशत लोगों को हो गई।

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योगा करने वालों को लॉकडाउन में कम हुआ तनाव, बैचेनी और डिप्रेशन

आईआईटी दिल्ली की स्टडी रिपोर्ट में सामने आया है कि योगा करने वालों को लॉकडाउन के चार से दस हफ्ते के दौरान तनाव, बैचेनी और डिप्रेशन का सामना कम करना पड़ा। यही नहीं इस दौरान योगा करने वालों का मानसिक स्वस्थ भी काफी उत्तम रहा। योगा एन इफेक्टिव स्ट्रेटेजी फॉर सेल्फ मैनेजमेंट ऑफ स्ट्रेस रिलेटेड प्रॉब्लम्स एंड वेलबिइंग नाम से यह अध्ययन आईआईटी दिल्ली के वैज्ञानिकों ने किया है। इस अध्ययन को प्लस वन जनरल में प्रकाशित भी किया गया है।

स्टडी में ये आया सामने

लंबे समय से योगा करने वालों का खुद पर नियंत्रण और कोविड से बचने की संभावना अधिक पाई गई। जबकि इसके मुकाबले मध्यकालिक और कुछ समय पहले ही योगा करने वाले में यह संभावना लंबे समय से योगा करने वालों के मुकाबले कम थी। वहीं लंबे समय से योगा करने वालों में बैचेनी, डिप्रेशन की दिक्कत न के बराबर थी। उनका मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर था।

पूजा साहनी ने कहा कि कोविड-19 में तनाव से निपटने के लिए योगा को सुझाया गया था। पर अभी इसके कई साक्ष्य मिलने शेष है जो इस दावे को पुख्ता करेंयह अध्‍ययन आईआईटी दिल्‍ली के नेशनल रीसोर्स सेंटर फॉर वैल्‍यू एजुकेशन इन इंजीनियरिंग (एनआरसीएफवीएईई) के वैज्ञानिकों की टीम द्वारा किया गया था. इस शोध टीम में डॉ पूजा साहनी, नितेश और मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभाग, आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर डॉ कमलेश सिंह के अलावा एनआरसीएफवीएईई हेड प्रो राहुल गर्ग शामिल थे ।