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मैदान छोड़ दरोगाई से उपजी तबाही

मैदान छोड़ दरोगाई से उपजी तबाही

 

हम हिंदुस्तानियों ने तो संकट के वक्त दरोगाओं को पुकारना बहुत पहले छोड़ दिया था, क्योंकि हमें पता है कि कम से कम संकट से निजात दिलाने तो दरोगाजी नहीं आएंगे। आदतन वे संकट को बढ़ा तो सकते हैं, घटा नहीं सकते। लेकिन लगता है कि अब तो पश्चिमवालों को भी पता चल गया है कि संकट से बचाने दरोगाजी नहीं आने वाले। खैर, अमेरिका को अब तक दुनिया का दरोगा माना जाता था। वह कहीं भी अपना डंडा फटकारता हुआ निकल जाता था। बताते हैं कि लातीनी अमेरिका में तो वह वैसे ही जाता था, जैसे अपने यहां पुलिसवाले झुग्गियों में हफ्ता वसूली के लिए जाते हैं। फिर वह खाड़ी देशों में भी अपने फौज-फांटे के साथ ऐसे ही आने लगा। उसने इराक को तबाह किया, लीबिया को तबाह किया। जैसे पुलिसवाले कानून और व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए अपना डंडा फटकारते हैं, वैसे ही अमेरिका भी दुनिया में लोकतंत्र की स्थापना करने के लिए अपना फौज-फांटा लेकर पहुंच जाता है।

हम तो यह असलियत पहले से ही जानते हैं कि पुलिस पहुंचने का असली मकसद उगाही ही है। दुनियावाले अब जान रहे हैं। दरोगाजी कभी-कभी मजे लेने के लिए किसी सींकिया पहलवान को किसी दादा के खिलाफ लहका भी देते हंै और फिर पुलिस की शह पर वह उससे भिड़ भी जाता है और आखिर में कुटता-पिटता है। आज यूक्रेन भी रूस के हाथों ऐसे ही कुट-पिट रहा है। असल में अमेरिका ने ही यूक्रेन को रूस के खिलाफ लहका दिया था कि यार तुम नाटो में आ जाओ, फिर पूरे नाटो के सामने रूस की क्या बिसात है। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलंेस्की यूं तो कॉमेडियन रहे हैं, लोगों को हंसाते रहे हैं। लेकिन वे अमेरिका के इस मजाक को समझ ही नहीं पाए। और अब हंसने की बजाय रुदन कर रहे हैं। अमेरिका और पश्चिमवालों को कोस रहे हैं कि हमें पिटवा दिया। अपनी बहादुरी का प्रदर्शन करने के लिए तो वे फिर भी डोले-वोले चमका रहे हैं, पर अमेरिका और पश्चिमवालों को कायर कह रहे हैं। कह रहे हैं कि हमें युद्ध में फंसाकर अब दूर खड़े तमाशा देख रहे हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन अखाड़े के बाहर खड़े होकर पुतिन को गालियां तो खूब दे रहे हैं लेकिन यूक्रेन को बचा नहीं पा रहे हैं। जैसे मौके का मुआयना करने के लिए दरोगाजी पड़ोस की गली में होकर चले जाते हैं, वैसे ही वे पोलैंड तक आकर चले गए। जेलेंस्की ज्यादा ही नाराज होंगे तो कह देंगे कि यार हमने पूरी दुनिया को कह तो दिया कि रूस से तेल मत खरीदना। उसे डरा तो दिया, धमका तो दिया, गालियां भी दे दीं। अब तुम्हारे लिए और क्या करें बताओ? बस वह यह नहीं कहेगा कि यार वह रूस है, इराक थोड़े ही, लीबिया थोड़े ही है, लातीनी अमेरिका का कोई चंगू-मंगू थोड़े ही है। समझा करो यार।