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पलास या खाकरे के पेड़ के अस्तित्व को मंडराने लगा है खतरा, संरक्षण की है जरूरत

पलास या खाकरे के पेड़ के अस्तित्व को मंडराने लगा है खतरा, संरक्षण की है जरूरत

राजसमन्द (राव दिलीप सिंह) बहुउपयोगी, पवित्र एवं आकर्षक "जंगल की आग" कहलाने वाला पलाश अथवा खाकरे का पौधा बसंत ऋतु में अपने सुंदर फूलों द्वारा जंगल को अपने लाल-पीले रंग से भर देता था तथा सहज ही फूलों से लदे हुए पलाश के पेड़, जीव मात्र को  अपनी और आकर्षित करते थे !लेकिन, फेबेसी कुल का सदस्य पलाश (ब्यूटीया मोनोस्पर्मा) मझोले आकार का यह वृक्ष, अपने अस्तित्व को लेकर संकट में है, क्योंकि जितनी मात्रा में पलाश अथवा खाकरे की कटाई की जा रही है, उस अनुपात में इसका रोपण एवं संरक्षण नहीं किया जा रहा और तेजी से इस बहुपयोगी पादप प्रजाति पर संकट मंडराने लगा है !

आमेट , देवगढ़,भीम,,खमनोर,कुम्भलगढ ,नाथुद्वारा,रेलमगरा आदी के जंगलों में खाकरे के पेड़ों की संख्या बहुतायत में......

       राजसमंद जिले की अरावली पर्वत श्रृंखला, जहां पर प्राकृतिक जलस्रोत नदियां, तालाब, आदि का प्रवाह एवं संचय क्षेत्र है, उन स्थानों पर खाकरे के पेड़ बहुतायत से पाए जाते हैं ! जो वन्य जीव अभ्यारण में कुंभलगढ़ सहित अन्य प्राकृतिक स्थलों नाथद्वारा,रेलमगरा,,  खमनोर, आमेट, देवगढ़ कुम्भलगढ आदि क्षेत्रों में जंगलों की सुंदरता एवं शोभा बढ़ाने में गर्मी के मौसम में पलाश पौधे की महत्वपूर्ण भूमिका है और इन क्षेत्रों में देश-विदेश से आने वाले पर्यटक एवं प्रकृति प्रेमियों को पलाश का आकर्षक सुंदर फूलों व चौड़ी पत्तियों से लद पद पौधा सहज ही अपनी और आकर्षित करता है !

गुणों की खान एवं संस्कृति की पहचान है, पलाश का पवित्र पौधा

भारतीय संस्कृति  की मान्यता के अनुसार पलाश का पौधा पवित्र माना गया है, जिसकी लकड़ी को पवित्र मानते हुए यज्ञ हवन सामग्री के रूप में काम में लिया जाता है ! इस पौधे की जड़ से लेकर, तना, छाल,पत्तियां, पुष्प, फलियां, बीज, आदि सभी भाग अत्यंत ही औषधीय गुण एवं उपयोगी है !पलाश के पौधे की मोटी छाल से गोंद एवं रेशे प्राप्त किए जा सकते हैं जिनमें औषधीय गुण होते हैं !वही पलाश के पौधे की जड़ों से प्राप्त रेशे रस्सी बनाने रंग व पुताई करने हेतु ब्रश बनाने में उपयोग में ली जाती है ! खाकरे अथवा पलाश के चौड़े पत्ते विघटनकारी व प्रकृति हितकारी मानव आहार में उपयोगी पत्तल-दोने निर्माण में काम में ली जाती हैं ! वही मवेशियों के लिए पत्तियां पोस्टिक आहार हैं, जिनसे उनके दुग्ध में वृद्धि होती है ! पलाश के बड़े, अर्धचंद्राकार एवं गहरे लाल रंग के पुष्प, जोकि फागुन महीने के अंत और चैत्र मास के आरंभ में लगते हैं ! उस समय पौधे के सभी पत्ते झड़ चुके होते हैं और पेड़ फूलों से लदपद हो जाते हैं जो देखने में आकर्षक होते हैं और नेत्रों को सुखद अनुभूति देते हैं ! इन पुष्पों से मकरंद एवं प्राकृतिक रंग निर्मित किए जाते हैं ! फूलों के झड़ जाने पर, इन शाखाओं से चोड़ी फलियां निकलती हैं जिनमें गोल और चपटे बीज होते हैं ! इन फलियों को पलाश पापड़ा या पापड़ी तथा इनके बीजों को पलाश बीज कहते हैं ! पलाश के फूल एवं बीज औषधीय गुणों वाले एवं सौंदर्य प्रसाधन हेतु सामग्री निर्णय निर्माण में काम आते हैं ! पलाश के बीज कर्मीनाशक औषधि निर्माण का प्रमुख स्रोत है ! इसलिए बहु- उपयोगी पलाश के पौधे का तेजी से हो रहा उन्मूलन व विनाश का रुकना बहुत जरूरी है !

पवित्र पलाश के पौधे की नर्सरीयां विकसित कर, प्रकृति आधारित पत्तल-दोने व्यवसाय को  प्रोत्साहन मिलना जरूरी.....

पर्यावरणविद शिक्षक कैलाश सामोता कुंभलगढ़ का कहना है कि जंगल की इस बहु उपयोगी वनस्पति को बचाने के लिए, क्षेत्र में अधिकाधिक पलाश की नर्सरी या विकसित करने, आमजन को निशुल्क पलाश के पौधे उपलब्ध कराए जाने तथा इसकी कटाई को प्रतिबंधित किए जाने की आवश्यकता है ! साथ ही पलाश पौधे पर आधारित पत्तल- दोने, रस्सी, ब्रश, मकरंद, शहद, गोंद एवं प्राकृतिक रंग निर्माण के लघु उद्योगों को बढ़ावा देकर, आमजन को प्रकृति आधारित रोजगार दिए जाने की जरूरत है ! सड़क निर्माण, खेत निर्माण अथवा अन्य विकास के नाम पर पलाश के पवित्र पौधे का विनाश रुकना चाहिए, ताकि प्रकृति की इस सुंदर वन संपदा एवं वन्य जीवो के विलुप्त होने के संकट को कम किया जा सके !