पर्युषण पर्व का पहला दिन उत्तम क्षमा धर्म की आराधना के रुप में मनाया

भीलवाड़ा। दिगम्बर जैन समाज की ओर से शुक्रवार को पर्युषण पर्व का पहला दिन उत्तम क्षमा धर्म की आराधना के रुप में मनाया गया। श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट के सचिव अजय बाकलीवाल ने बताया कि प्रातः 6.00 बजे से अभिषेक प्रारम्भ हुआ। जिसमें में श्रावकों ने जिन प्रतिमाओं पर अभिषेक किया। बालयति निर्यापक मुनि विद्यासागर महाराज ससंघ के सानिध्य में नरेश, नितिन, पीयूष गोधा ने जब स्वर्ण कलश से आदिनाथ भगवान का प्रथम अभिषेक किया तो मंदिर जयकारों से गूंज उठा। इसके साथ गोधा परिवार ने 108 रिद्धी मंत्र से अभिषेक एवं स्वर्ण झारी से शांतिधारा की। श्रावकों ने अन्य 9 प्रतिमाओं पर शांतिधारा की। अभिषेक के पश्चात् संगीतमयी पूजन में देव शास्त्र गुरु, आदिनाथ भगवान, सौलह कारण, पंच मेरु की पूजन के साथ दस धर्म की पूजन एवं उत्तम क्षमा धर्म की पूजा की गई। इस अवसर पर मनोज अजमेरा, विनोद फाडोत, आत्मप्रकाश लुहाडिया, राजेन्द्र सेठी, मांगीलाल बडजात्या, बी एल जैन ने कमलादेवी कासलीवाल, मृदुला सेठी, कमला अग्रवाल, निर्मला सेठी, प्रतिभा गंगवाल, लीना शाह, रचना सिंघई, अनिता शाह, गुणमाला पाटोदी, इन्द्रादेवी अग्रवाल सहित श्रावक-श्राविकाओं ने भाग लिया।
प्रवचन सभा में बात बालयति निर्यापक श्रमण मुनिश्री विद्यासागर जी महाराज ने सुधासागर निलय में ज्ञानापयोग भावना पर प्रवचन के दौरान कहाकि ज्ञान जीव का स्वभाव है, लेकिन यह आत्मा के लिए हितकारी होना चाहिए। शाब्दिक ज्ञान सभी के पास होता है लेकिन उसमें उलझने वाले को ज्ञान नही कह सकते है। ’’कितने नादान होते है गुब्बारे, कि चंद सांसो में ही फूल जाते है।’’ जो ज्ञान हमारी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है वही सच्चा ज्ञान कहलाता है। इसके माध्यम से कर्म सिद्धान्त को जानकर व्यक्ति हिंसादि पांच पापों से बचकर शुभ कार्यो में लग कर शुद्ध बन सकता है। जैसे-जैसे आध्यात्मिक ज्ञान बढता है, वैसे-वैसे भीतर में विवेक की लौ जागृत होकर राग, द्वेष आदि कषायों का घटना प्रारम्भ हो जाता है।
महाराज ने कहा कि भारत वर्ष पर्वो का देश है। पर्व ही समाज और देश को जोडते है। आज हम दशलक्ष्मण पर्व मना रहे है, वहीं गणेश चतुर्थी का मंगल पर्व भी आज है। पयूर्षण के पहले दिन उत्तम क्षमा धर्म की आराधना की जाती हैै। अग्नि, वायु, जल के साथ सूक्ष्म से लेकर पंच इन्द्रिय जीव तक की रक्षा के भाव के साथ अपने एवं दूसरे के हित करना, कोध्र का प्रतिहार करना क्षमा धर्म है। यह उत्तम रुप से मुनि को होता है, जो कि उपसर्ग आदि आने पर भी शांत मुद्रा में क्षमाभाव रखते है।
