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पायड़ा मंदिर में 17 वर्ष बाद हुआ गुरु-शिष्य का महा मिलन

पायड़ा मंदिर में 17 वर्ष बाद हुआ गुरु-शिष्य का महा मिलन
उदयपुर ।  पायड़ा स्थित पद्मप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर में शुक्रवार को ऐतिहासिक पल देख सैकड़ों श्रावक-श्राविकाएं भाव विभौर हो गए। पायड़ा जैन मंदिर में चातुर्मास कर रहे आचार्य कुशाग्रनंदी महाराज व उपाध्याय मुनि दया ऋषि महाराज का 17 वर्ष बाद गुरु-शिष्य महामिलन का हुआ। प्रचार संयोजक संजय गुडलिया, दीपक चिबोडिया ने बताया  कि  महामिलन के बाद शिष्य ने गुरु आचार्य कुशाग्रनंदी महाराज का दुध, केसर व जल से पादप्रक्षालन किया। उस दौरान शिष्य दयाऋषि एवं मौजूद सैकड़ों श्रावक-श्राविकाए इस ऐतिहासिक पल को देख भाव विभौर हो गए और आंखों से आंश्रु धारा फूट पड़ी।  दोनों मुनियों की आहर चर्या पायड़ मेंं हुई। इस अवसर पर मुनि अजयदेव व भट्टारक देवेंद्र विजय, ब्रम्हचारिणी आराधना दीदी व अमृता दीदी संघ का सानिध्य भी प्राप्त हुआ। आचार्य कुशाग्रनंदी महराज एवं उपाध्याय मुनि दया ऋषि संघ के सानिध्य में महाशांतिधारा हुई। 
सविना से करीब 100 से अधिक श्रावक-श्राविकाओं के मुनि आचार्य कुशाग्रनंदी महाराज के दर्शनार्थ हेतु सुबह 6.15 बजे जैन मंदिर से उपाध्याय मुनि दया ऋषि एवं मुनि शैल नंदी महाराज के साथ रवाना हुए  जो गायरियावास, टेकरी, कुम्हारों का भट्टा, दुर्गानर्सरी रोड, आयड़ पुलिया, नागदा रेस्टोरेन्ट, बेकनी पुलिया, गणेशघाटी, विश्वविद्यालय मार्ग होते हुए पायड़ा स्थित पद्मप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर पहुंचे। जहां दोनों गुरु-शिष्य का महामिलन हुआ। चातुर्मास समिति के अध्यक्ष धनराज सकरावत ने बताया कि इस दौरान सविना से आए सैकड़ों श्रावकों ने आचार्य संघ को श्रीफल भेंट कर सविना में अगला चातुर्मास करने की विनती की।  मंच संचालन अनिल सकरावत ने किया। इस अवसर पर सकल दिगम्बर जैन समाज पायड़ा, आयड़ व केशवनगर के धर्म प्रेमी महिला-पुरूष आदि उपस्थित थे।
इस दौरान आयोजित धर्मसभा में आचार्य कुशाग्रनंदी महाराज ने कहां  तीर्थ के निर्माता तीर्थंकर होते है। सभी के जीवन में कोई न कोई समस्या मौजूद है। सबसे बड़ी समस्या जन्म मरण की है। ये समाप्त हो जाए तो कोई समस्या नहीं रहेगी।   उन्होंने कहा कि जन्म-मरण की समस्या का समाधान निकालने के लिए तीर्थंकर धर्मतीर्थ की स्थापना करते है। जब तक समस्या का अंत नहीं होगा समस्याएं सामने आती रहेगी। जन्म-मरण की जड़ हरी रहेगी तो प्रॉब्लम के पत्ते लगते रहेंगे। धर्म तीर्थं की स्थापना करने वाले तीर्थंकर होते है। अपने जीवनकाल में एक तीर्थ अवश्य बनाने का संकल्प लेना चाहिए। परमात्मा जीवित तीर्थ बनाते है। कम से कम किसी एक को जिनशासन के साथ, नवकार मंत्र के साथ, परमात्मा के साथ जोड़ दो तुम्हारे द्वारा एक तीर्थं का निर्माण हो गया। यदि किसी को तीर्थ तुमने बनाया तो वह तीर्थ जन्म-जन्मांतर तक तुम्हारी मदद करेगा।