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शीश भले कट जाए लेकिन गाय नही कटने देगें- संत गोपालानन्द सरस्वती

शीश भले कट जाए लेकिन गाय नही कटने देगें- संत गोपालानन्द सरस्वती

राजसमन्द (राव दिलीप सिंह) श्री पंचमुखी हनुमान नंदी गोशाला आगरिया में चल रही श्री गोकृपा कथा महोत्सव के तीसरे दिन रविवार को कथा व्यास संत गोपालानन्द सरस्वती ने कहा कि गोमाता की रक्षा में शीश भले कट जाए लेकिन गाय नही कटने देगें। उन्होने कहा कि गोमाता का प्रकटीकरण सामान्य परिस्थितियों में नही हुआ। गाय भारतीय संस्कृति का आधार है। मुगलो एवं अंग्रेजो ने पहले गाय को नष्ट करने का कार्य किया। लड्डू गोपाल तब तक खुश नही जब तक घर में गाय नही है। जिस घर में गाय नही कन्हैया उदास दिखेगें। समुद्र मंथन से चौदह रत्न निकले उसमें एक रत्न कामधेनु थी। जीवन में मां व बाप बनना मुश्किल है बेटा बनना सरल है। हमे गोवत्स बन कर अपने कृत्य का पालन करना है। पुत्र बन कर गो से प्रेम करने से सारे अभिष्ट पूरे हो जाते है। गोमाता ही मंगलकारी है। गोमाता के पास सब समस्याओ का समाधान है। पाप कर्म के भाव से संवेदना का स्थानान्तरण ही नजर है। गाय की पूछ नजर उतारने में श्रेष्ठ है।  बालक की नजर उतारने के लिए आठ अंगो में गो रज एवं बारह अंगो में गोबर लगाने से आसुरी शक्तियों का प्रभाव कम हो जाता है। गोमाता की साक्षी में बच्चे का नामकरण संस्कार करने से जैसा नाम वैसे गुण होगें। दही सोम्य पुष्प है। इसलिए पूजा में पुष्प की जगह दही का उपयोग करते है। छः माह तक बच्चो कको जन्मदात्री मां का दूध पिलाना चाहिए। कोई विशेष परिस्थिति होने पर गाय के दूध में बराबर मात्रा में पानी मिला कर चम्मच से बच्चे को पिलाना चाहिए। बच्चे के अन्नप्राशन संस्कार में सात दिन तक पंचगव्य खिलाना चाहिए। विद्या आरम्भ संस्कार में गाय की बहुत बड़ी भूमिका है। शिक्षा में गाय नही तो उसकी पढाई अधुरी है। बच्चो की पढ़ने जाने की वास्तविक आयु 6 वर्ष है। 6 वर्ष तक की आयु बच्चो के खेलने की उम्र है। वर्तमान में अभिभावकों ने बच्चों का खेल छीन लिया हैं। 2 से 3 वर्ष की उम्र में बच्चो के कंधे पर पुस्तकों का बोझ लाद दिया जाता है। खेल से बच्चे का शारीरिक विकास होता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। वर्तमान में शिक्षा की दूर्गति अधकचरा ज्ञान है। पात्र पढ़ता है तो पूरे विश्व को फायदा होता ओर कुपात्र पढ़ता तो सभी का नुकसान ही करता है। इसलिए शिक्षा के लिए पात्रता जरूरी है। कथा के दौरान बंशी जोर री बजाई रे नन्दलाला.., श्रीराम जय राम जय जय राम....,यह अवसर फिर नही मिलने वालने का गोदान करो गोदान करो....आज मारा कानूड़ा रे कई वैग्यो...., राम से बड़ा राम का नाम....गोमय धरती देती है अमृत युक्त फसले भरपूर...आदि संगीतमय भजनो की प्रस्तुति दी गई। कथा में संतों, विशिष्ट जनो सहित बड़ी संख्या में गोभक्त उपस्थित थे। 

 

तुलादान पर लगा तांता

 

गोशाला परिसर में लगाए गए तुलादान पर भक्तो का तांता लगा रहता है। श्री गोकृपा कथा महोत्सव, श्रीविष्णु यज्ञ एवं गोशाला के संगम में भक्त तुलादान कर पुण्य के भागी बन रहे है। तुलादान में अपने वजन के बराबर गुड़, दलिया, तील, पोष्टिक आहार, हराघास आदि का दान किया जा रहा है।

 

अखण्ड भारत के नक्शे पर दीपदान

 

नन्दी शाला में यज्ञशाला के पास अखण्ड भारत का नक्शा बनाया गया है। जिस पर प्रतिदिन सांय 108 दीपक जलाकर दीपदान किया जाता है। वही पूरे गोशाला परिसर को रंगोली आदि अन्य झांकियो से प्रतिदिन अलग अलग सजाया जाता है।

 

देर रात तक बही भजनों की सरिता

 

 रविवार को कथा के बाद भजन संध्या का आयोजन किया गया। भजन गायक दिलीप पालीवाल तासोल ने गणपति वंदना से भजन संध्या की शुरुआत की। भजन संध्या में गुरु बिन घोर अंधेरा, सतगुरु आया पावणा, अब तक तो निभाया है आगे भी निभा देना, अब तुम दया करो मेरी गिरधर ,  इस पापी युग में गोमाता का कोई नही रखवाला जय गोविंदा जय गोपाला, हाथ जोड़ कर अर्ज करू सुन लिजो बाता मारी गोमाता की सेवा कर लो गोमाता है महाकाली , मोहन आओ तो सही गिरधर आओ तो सही माधव के मंदिर में मीरा एकली खड़ी, सांवरा थारी माया को पायो कोनी पार भेद कोनी जानियो रे  दयालु दीना नाथ, मेरे सिर पर रख दो बाबा तेरे ये दोनो हाथ, जिणी जिणी उड़े से गुलाल छोगला रा मंदिर में सावरिया रा मंदिर में आदि भजनो की देर रात तक प्रस्तुतिया दी।