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गैंगस्टर संस्कृति का फैलाव गंभीर चुनौती

गैंगस्टर संस्कृति का फैलाव गंभीर चुनौती

गायक-अभिनेता से राजनेता बने सिद्धू मूसेवाला की निर्मम हत्या पंजाब में फल-फूल रही गैंगस्टर संस्कृति की भयावह तस्वीर उकेरती है। साथ ही हाल ही के वर्षों में गैंगस्टरों के बेखौफ अपने घातक इरादों को अंजाम देने से उपजे संकट को भी दर्शाती है। जहां पुलिस द्वारा चलाये गये अभियानों में कुछ गैंगस्टर मारे गये, वहीं आपसी प्रतिद्वंद्विता के चलते भी कई अपराधी मारे जा चुके हैं। लेकिन उनके नक्शेकदम पर चलने वाले दूसरे अपराधी इन गैंगों में भर्ती हो जाते हैं। दरअसल ये अपराधी तत्व हत्या, जबरन वसूली, हथियारों की तस्करी और मादक पदार्थों की खरीद-फरोख्त जैसे गैर-कानूनी कार्यों में लिप्त रहते हैं। विभिन्न प्रकार के अपराधों को अंजाम देने वाले अपराधियों का गठजोड़ स्थिति को गंभीर बना रहा है। सिद्धू मूसेवाला की हत्या में पंजाब पुलिस प्रथम दृष्टया दो कुख्यात गिरोहों की प्रतिद्वंद्विता को जिम्मेदार मानकर चल रही है। यह भी दावा किया जा रहा है कि हत्या के तार वर्ष 2021 में एक युवा अकाली नेता की हत्या से जुड़े हो सकते हैं, जिसके प्रतिशोध के चलते ही इस हत्या को अंजाम दिया गया होगा। यहां उस दुर्दांत गैंगस्टर की कारगुजारियों की जांच की जरूरत महसूस की जा रही है जो जेल की सलाखों के पीछे से गंभीर वारदातों को अंजाम देता रहा है। बताया जाता है कि वह भारत व विदेशों में स्थित भारत विरोधी ताकतों के हाथ में खेल सकता है जो दरअसल, पंजाब में गड़बड़ी फैलाना चाहते हैं। यही वजह है कि पुलिस इस कांड में विदेशी हाथ की दिशा में भी जांच में जुटी है। वहीं दूसरी ओर इस हत्याकांड को लेकर राजनीतिक टिप्पणियां सामने आई हैं। सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी की सरकार की इस बात को लेकर आलोचना की जा रही है कि उसने हमले के आसन्न खतरे को नजरअंदाज करके सिद्धू मूसेवाला की सुरक्षा में कटौती की थी। कहा जा रहा है कि गैंगस्टरों द्वारा पेश की गई चुनौती की व्यापकता का आकलन करने में राज्य सरकार पूरी तरह से विफल रही है।

हालांकि, कानून व्यवस्था को लेकर मान सरकार तमाम दावे विगत में करती रही है। राज्य के मुख्यमंत्री का दायित्व संभालने के कुछ समय बाद ही मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इस उद्देश्य से लक्ष्य के लिये समर्पित विशेष पुलिस इकाई के गठन के आदेश भी दिये थे। दरअसल, राज्य में एंटी-गैंगस्टर टास्क फोर्स को एक कठिन चुनौती का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि राज्य में पांच सौ से अधिक सदस्यों वाले करीब सत्तर गिरोह आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहे हैं, जिनमें से करीब तीन सौ गुर्गे विभिन्न जेलों में बंद हैं। लेकिन यदि अपराधी जेल के भीतर रहकर भी अपराधों को अंजाम देने में कामयाब हो जाते हैं तो यह पंजाब व अन्य राज्यों के जेल अधिकारियों की लापरवाही को ही उजागर करता है। जिसके चलते गिरोह के सदस्य बंदूक संस्कृति का सोशल मीडिया के जरिये महिमामंडन में लगे रहते हैं। जिसका मकसद अपने गिरोहों में भटके हुए नये युवाओं को शामिल करना होता है। इस बात के तमाम सबूत कानून प्रवर्तन एजेंसियों को मिले भी हैं। इस चुनौती से मुकाबले के लिये पुलिस व अन्य खुफिया एजेंसियों को मिलकर काम करने की जरूरत है। इसके लिये अन्य राज्यों की पुलिस से बेहतर तालमेल करने की जरूरत है। वहीं पंजाब में गैंगस्टरों के खतरे को देखते हुए पार्टी स्तर से ऊपर उठकर दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति दिखाने की भी जरूरत है। इस कार्य में केंद्र सरकार की भी मदद ली जानी चाहिए ताकि दूसरे देशों में सक्रिय पंजाब के गैंगस्टरों के प्रत्यर्पण के लिये दूसरे देशों पर दबाव बनाया जा सके। इस गंभीर चुनौती पर राजनीति करने से भी राजनीतिक दलों को बाज आना चाहिए। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों से समस्या दूर होने के बजाय अधिक उलझ सकती है। राज्य की पहली प्राथमिकता शांति व स्थिरता कायम करने की होनी चाहिए। हमें विगत के उस काले अध्याय को याद करना चाहिए, जिसके लिये राज्य ने बड़ी कीमत चुकायी है। हमारा प्रयास हो कि ऐसी स्थितियां राज्य की जनता को फिर से न देखनी पड़ें।