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 वज्रपात : बसने वाली थी गृहस्थी, कोरोना से दूल्हे की मौत, चकनाचूर हुए सपने

 वज्रपात : बसने वाली थी गृहस्थी, कोरोना से दूल्हे की मौत, चकनाचूर हुए सपने

भीलवाड़ा (हलचल)। मेहंदी, फेरे और उसके बाद एक नई जिंदगी की शुरूआत। एक लड़की की जिंदगी में आने वाली नई खुशियों की उम्मीदें। ऐसे ही ख्वाब सजाती है एक लड़की जब उसकी शादी होने वाली होती है लेकिन समय का पहिया कब घूम जाए, इसका आभास किसी को नहीं होता। सुख की जगह दुख का पहाड़ कब टूट पड़े, यह कोई नहीं जानता। कुछ ऐसा ही हुआ एक लड़की के साथ जो चार दिन बाद एक नई जिंदगी की शुरुआत करने वाली थी।
घर में चारों ओर खुशी का माहौल था। मंगल गीत गाए जाने थे। सब खुश थे कि बारात आएगी और बेटी को ले जाएगी लेकिन समय को कुछ और ही मंजूर था। काल का पहिया ऐसा घूमा कि खुशियों की जगह रुदन ले ली। लड़की की शादी होने के कुछ दिन पहले ही दूल्हे की कोरोना से मौत हो गई। घर में खुशियों की जगह मातम ने ले ली। अब मंगल गीत की जगह रोने की आवाज गूंज रही है।
भीलवाड़ा का बापूनगर कोरोना हॉटस्पॉट बना हुआ है। इस क्षेत्र में रोज नए संक्रमित मिल रहे हैं वहीं इस क्षेत्र में शुरू हुआ मौतों का सिलसिला भी थमने का नाम नहीं ले रहा है।  जो युवक दूल्हा बनकर दुल्हन लाने वाला था वह भी बापूनगर का ही रहने वाला था। घोड़ी पर सवार होकर दूल्हे के रूप में सेहरा सजाकर दुल्हन को उसके घर से विदा करके ले जाने वाला दूल्हा कोरोना की चपेट में आकर खुद दुनिया से विदा हो गया। इस बात की खबर जैसे ही दुल्हन के परिवार वालों को मिली तो मानों उन पर बिजली टूट पड़ी। शादी की सारी तैयारियां धरी रह गई। हर तरफ रोने की आवाजें आ रही है। यह माहौल देखकर हर कोई अपना दिल थामने को मजबूर हो जाता है। विधाता ने ऐसा खेल खेला कि नई गृहस्थी के सपने संजोने वाली दुल्हन अपनी सुध-बुध खो बैठी है। घर वाले ढांढ़स बंधाते हैं लेकिन दुल्हन की रह-रहकर सिसकियां सन्नाटे को तोड़ देती है। कोरोना का कहर अब किसी को नहीं बख्श रहा है। जवान, बुजुर्ग या फिर अधेड़, सबको कोरोना लील रहा है। बच्चों के सिर से मां-बाप का साया उठ रहा है, मां-बाप के बुढ़ापे की लाठी छिन रही है। औरतें बेवा हो रही हैं। कोरोना किसी पर भी तरस नहीं खा रहा है। कुछ दिन बाद मांग में सिंदूर भरने वाली दुल्हन शादी से पहले ही बेवा हो गई। हालांकि अब उसकी शादी किसी और से हो जाएगी लेकिन वक्त ने उसे जो जख्म दिया है, वह जिंदगीभर नहीं भर सकेगा। उसे ताउम्र सालता रहेगा लेकिन वक्त के आगे किसकी चलती है। जो नियति को मंजूर होता है, वह होकर रहता है।