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विद्यार्थियों में समाहित हो विद्या, विनय व विवेक की त्रिवेणी : आचार्य महाश्रमण    

विद्यार्थियों में समाहित हो विद्या, विनय व विवेक की त्रिवेणी : आचार्य महाश्रमण    

बरुन्दनी, भीलवाड़ा।  वीरों की धरती मेवाड़ क्षेत्र के भीलवाड़ा जिले में अपनी अहिंसा यात्रा के साथ गतिमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, शान्तिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ मंगलवार को बड़लियास से प्रातः की मंगल बेला में प्रस्थित हुए तो अनेकानेक ग्रामीणों ने आचार्यश्री के दर्शन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। विहार मार्ग में आने वाले विभिन्न गांव के लोगों ने आचार्यश्री को वन्दन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। लोगों को अपने मंगल आशीष का अभिसिंचन प्रदान करते हुए आचार्यश्री लगभग दस किलोमीटर का विहार कर बरुन्दनी गांव स्थित श्रीमुनिकुल ब्रह्मचर्याश्रम वेद संस्थानम् में पधारे तो वेदपाठी विद्यार्थियों व अध्यापकों ने आचार्यश्री का वेदमंत्रों से स्वागत-अभिनन्दन किया। 

    वेद संस्थानम् परिसर में आयोजित प्रातःकाल के मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित विद्यार्थियों व श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आदमी को सुकुमारता छोड़कर कठोर जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए। भौतिक सुविधाओं का उपभोग यथासंभव कम करने और कठोर जीवन जीने और खुद तपाने का प्रयास करना चाहिए। सुविधाओं को भोगना और उससे सुखी होना एक बात है और आंतरिक सुख की प्राप्ति दूसरी बात है। आदमी को सयंमित जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए। आदमी अपने जीवन में संयम की साधना करे और भौतिक सुविधाओं के उपयोग में जितना संभव हो सके कमी करने का प्रयास करे तो जीवन सुखदायी बन सकता है। 

    जैन साधुचर्या, पंचमहाव्रतों आदि का वर्णन करने के पश्चात आचार्यश्री ने विद्यार्थियों को विशेष प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि सुख चाहने वाले को ज्ञान कहां और ज्ञान चाहने वालों को सुख का मानों त्याग करना पड़ता है। पाठ का अध्ययन करना, उसका पुनरावर्तन करना, जिज्ञासा करना और लिखने के बाद तब व्याकरण का ज्ञान हो सकता है। इस प्रकार ज्ञान को कंठस्थ किया जा सकता है। विद्यार्थियों को सत्पुरुषार्थ करते हुए विद्यार्जन का प्रयास करना चाहिए। ज्ञान बढ़े किन्तु उसका अहंकार नहीं आए। ‘विद्या विनयेन शोभते’ को व्याख्यायित करते हुए आचार्यश्री ने कहा विद्या विनय से सुशोभित होती है। विद्या, विनय और विवेक रुपी त्रिवेणी विद्यार्थियों में समाहित हो तो विद्याध्ययन सार्थक हो सकता है। आचार्यश्री के आह्वान पर विद्यार्थियों ने अहिंसा यात्रा की संकल्पत्रयी भी स्वीकार की। 

    वेद संस्थानम् संचालक बद्रीनारायण पंचोली ने आचार्यश्री के स्वागत में अपनी अभिव्यक्ति देते हुए कहा कि आपके संकल्प और आपके अभियान से पूरे विश्व में सुधार हो सकता है। आपने जिस त्रिवेणी की प्रेरणा दी है, आशा करता हूं हमारे विद्यार्थी उसे अवश्य ग्रहण करेंगे। आप जो पदयात्रा कर जनोपकार कर रहे हैं, उससे हम गौरवान्वित हैं। हम आज स्वयं को धन्य महसूस कर रहे हैं जो आपश्री का पदार्पण हमारे इस संस्थान में हुआ। आप स्वस्थ रहें, आपकी यात्रा मंगलमय हो। इसके उपरान्त पूर्व विधायक विवेक धाकड़, डॉ. वृजमोहन शर्मा,  प्रभुलाल सोमानी आदि ने भी आचार्यश्री के स्वागत में अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी और आचार्यश्री से पावन आशीर्वाद प्राप्त किया।  

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