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संसार में सबसे भारी है मूर्च्छा: मुनि आनंद कुमार

संसार में सबसे भारी है मूर्च्छा: मुनि आनंद कुमार

आसींद दशरथ सिसोदिया
आचार्य महाश्रमण के शिष्य मुनि हर्षलाल स्वामी एवं मुनि आनंद कुमार कालू पिछले 20 दिनों से लाछुड़ा स्थित तेरापंथ सभा भवन में प्रवासरत है। 
मुनि आनंद कुमार ने श्रावक श्राविकाओं को प्रवचनों में  कहा कि संसार में कोई भारी कोई चीज है तो वह मूर्च्छा है। मूर्च्छा से बढ़कर कोई भारी चीज नहीं है। मूर्च्छा का दूसरा नाम ममत्व है, मोह है। यह बुरा है । इसे हमें अपनापन या प्रेम भी कह सकते हैं, पर इस प्रेम का मतलब मैत्री नहीं है। विश्व-बंधुत्व दुनियाभर के जीवों के प्रति भाईचारे का व्यवहार है। वह यदि कुछ सीमित व्यक्तियों के प्रति होता है। यह स्वार्थ की प्रेरणा से होता है तो उसका नाम मूर्च्छा है। इसी तरह द्बेष भी महत्व है। कहने का तात्पर्य है कि  मूर्च्छा के दो प्रकार है द्वेष मूर्च्छा और राग मूर्च्छा। व्यक्ति किसी से  ईर्ष्या रखता है। मुनि आनंद कुमार ने कहा कि एक सेठ को प्रदेश से तार मिला जल्दी आओ। वे सेठानी को शीघ्र आने का आश्वासन देकर रवाना हो गए।  सेठ प्रदेश जाकर व्यापार में लग गए उन्होंने धन कमाया, खूब कमाया और उसके लोभ में वह सेठानी को दिया गया आश्वासन भूल गए । धन का प्रभाव ऐसा ही है ।व्यक्ति एक अग्नि से दूसरी अग्नि बुझाना चाहता है। वह चाहता है कि अबकी बार इस अग्नि में लकड़ी, घास या घासलेट डालकर शांत कर दूंगा, पर वे शांत होने के स्थान पर और अधिक प्रज्वलित होती है । सेठ धन से धन से धन इच्छा शांत करने का प्रयास करने लगे पर इच्छा बढ़ती गई। आखिर वे लखपति की सीमा लाघकर करोड़पति बन गए। इधर सेठानी गर्भवती थी।उसे पुत्र हुआ। सेठजी को समाचार भेजा गया । उनका जवाब आया मैं नाम संस्कार पर आ रहा हूं ।पर धन के लोभ में वे यह बात भी भूल गए।  जब सेठानी का पत्र आता है, तब तब  सेठजी को अपना आश्वासन याद आता है ।वह उस पर विचार करते हुए मन ही मन कहते हैं कि सेठानी को जाकर मना लूंगा। इससे भी ज्यादा  हुआ तो उससे माफी मांग लूंगा। उधर पुत्र बड़ा होते होते सगाई के योग्य हो गया सेठानी झुर झुर कर पिंजर हो गई। उसे ना भूख लगती , ना प्यास। उसका मन एकदम उदास रहता। एक दिन उनकी आंखों से अश्रु धारा बह निकली। पुत्र ने देखा और कारण पूछा। उसने सारी बात कह सुनाई। पुत्र ने कहा मां मैं जाता हूं पिताजी को लाने । सेठानी ने कहा नहीं बेटा मैं तुझे देख कर ही जी रही हूं। लेकिन  पुत्र नहीं माना। वह एक दो नौकर व मुनीम को  साथ लेकर पिता को लाने परदेश के लिए रवाना हो गया । उधर सेठ जी ने विचार किया कि बहुत पत्र आये पड़े हैं,  अब देश जाना है। वे रवाना हुए । साथ में लश्कर था। ठाकुर , मुनीम गुमाश्ते से काफी थे । चलते चलते एक शहर में पहुंच गए एक धर्मशाला में ठहरे । संयोग की बात । लड़का भी वही आ गया और एक  कमरे में ठहर गया। सेठ और पुत्र दोनों ही एक दूसरे को कैसे पहचानते । मुनीम भी नए रखे गए थे .इसलिए उनके तो पहचानने का प्रश्न ही नहीं था।  रात हुई सेठजी बड़े ठाट से सो गए। उधर लड़का भी अपने कमरे में कमरे में सोया । एकाएक उसके पेट में दर्द हुआ बहुत बढ़ता गया । वह रोने चिल्लाने लगा। सेठजी की नींद टूट गई। कड़कड़ाती  आवाज में बोले कौन आवाज कर रहा है। चुप करो। उसके पैसे के चाकर दौड़े उन्होंने चुप हो जाने के लिए कहा। चुप हो जाना उसके बस की बात नहीं थी। वह जानबूझकर तो नहीं रो रहा था। एक बार किसी तरह चुप हुआ। थोड़ी देर बाद वही रोना चिल्लाना फिर रोने लगा। इस तरह सेठजी की दो तीन बार नींद टूटी वह क्रोध और धन के मद में अंधे बन गए। बोले कौन बेवकूफ है यह, इतनी देर हुई मानता ही नहीं है। निकाल दो इसे बाहर ,यहां से हुकम मिलने की देर थी लड़के का बिस्तर बाहर फेंक दिया गया। लड़के के मुनिम ओर नौकरों की आंखों से आंसू बह निकले,  पर वे सब क्या करते हैं। सड़क पर पड़े रहे। लड़के के पेट का दर्द बढ़ता गया। अधिक बढ़ता गया। अंत में वह हमेशा के लिए मिट गया। दर्द नहीं, लड़का समाप्त हो गया। सेठजी सुबह जल्दी उठे उन्होंने नौकरों से पूछा रात कौन रो रहा था। उन्होंने कहा एक बच्चे का पेट दर्द कर रहा था। सेठजी ने पूछा अच्छा अब कहां है वह।नौकर ने बताया गली में। सेठ जी ने कहा देखो कि अब उसकी हालत कैसी है ।ठीक ना हो तो अपने पास दवाखाना है तो  उसे दवा  दे दो ।एक नौकर पता करने ।वापस आया  और बोला सेठ साहब वह तो मर गया ।सेठजी की मुंह से निकला है। वह कहां का था। बताया गया अमुक नगरी का । सेठ  बोले अच्छा वह तो मेरी नगरी का ही था ।  चलो देखो कि वह कौन था ।सेठ उसके पास आए उन्हें संदेह होने लगा कहीं मेरा मेरा लड़का तो नहीं है। लड़के का नाम पूछा उसके पिता का नाम पूछा सेठ  का संदेह  सच्चा निकला। वह रोने लगे। छाती पीटने लगे। लड़के को छाती से चिपकाया पर अब क्या होना था।  लड़के का मुनीम वह सब देख कर दंग रह गया। वह समझ नहीं पाया कि बात क्या है ।उसने सेठ के नौकरों से पूछा यह सेठ कौन है । जब उसे यह पता चला कि यह यह मेरे सेठ है रोते-रोते सारी बात बताई ।सेठ  विचार करने लगे कि कौन सा मुंह लेकर घर जाऊं। खैर यह किस्सा यही छोड़िए ।हमें जितना चाहे उतना आगे बढ़ाया जा सकता है। कहने का तात्पर्य इतना ही है कि ममत्व दु:खप्रद है । ममत्व से राग और द्वेष बढ़ता है। सेठ  को लड़के के प्रति पहले ममत्व तो नहीं था अत: दुख भी नहीं हुआ। जब उन्होंने उसे अपना जाना उन्हें अत्यंत दुख हुआ।
उन्होंने कहा कि मुनि जनों के सानिध्य में सुबह 5.30 बजे प्रार्थना के साथ-साथ मंगल पाठ, शाम को 7.20 बजे, रात को 8.15 बजे अहथ वंदना के साथ विशेष प्रवचन का सिलसिला जारी है। इस अवसर पर रिंकल देवी चोरड़िया, मंजू देवी चपलोत, कांता देवी छाजेड़, कमला देवी श्रीश्रीमाल, कंचन देवी चोरड़िया, कमलादेवी चोरड़िया, सज्जन देवी चोरड़िया, सीमा देवी चोरड़िया, नानू भाई चोरड़िया, सुंदर भाई चोरडिया आदि सहित महिलाएं उपस्थित थी। सेवादार देवी सिंह रावणा राजपूत का विशेष सहयोग रहा।