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बार-बार क्यों फिसल जाती हमारे ‘माननीयों’ की जुबान

बार-बार क्यों फिसल जाती हमारे ‘माननीयों’ की जुबान

 

इंसानी जुबान है या बर्फ का पर्वत जहां बार-बार फिसलन हो जाती है। हमारे माननीय जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों के नेताओं की जुबान बर्फ के पर्वत समान प्रतीत होने लगी है जहां फिसलन का भारी खतरा है। हर दिन कोई न कोई ऐसा विवाद या वाकया सामने आ जाता है जिसके पीछे कारण जुबान से निकले आस्था को चोट पहुंचाने वाले उटपटांग या विकृत शब्द होते है। पिछले सप्ताह एक नेताजी ने देश की प्रथम नागरिक हमारे आदरणीय राष्ट्रपति के लिए राष्ट्रपत्नी शब्द बोल दिया और सीधे गलती स्वीकार करने की बजाय दोष मढ़ दिया अपनी कमजोर हिंदी भाषा पर। अब उन नेताजी से जरा ये तो पूछा कि राष्ट्रपत्नी बोलने में कमजोर हिंदी जिम्मेदार कैसे हो गया। एक साधारण आदमी पर भी समझ जाएगा कि इसके पीछे दिमाग में सोच कुछ और थी लेकिन मामला तुल पकड़ गया तो ठीकरा हिंदी कमजोर होने पर फोड़ दिया। ये जुबान से उटपटंाग व अपमानजनक बोलने का पहला मामला नहीं था और कोई एक दल या नेता ही ऐसा नहीं कर रहा। कई बार तो उलटा-सीधा बोल चर्चा में आने की चाह में विवादास्पद बोलने के दृश्य जिस तरह एक के बाद एक सामने आते है उससे लगता है मानों हमारे नेताओं में ऐसा करने की होड़़ सी लगी है। आगे-पीछे के परिणामों की सोचे बिना मर्जी जो आए बोल कोई धार्मिक आस्थाओं से खिलवाड़ कर जाता है तो किसी जाति-समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाता है। बिना पुख्ता सबूत पास में हुए एक-दूसरें को नीचा दिखाने की होड भी कम नहीं लगी है। सभी ये साबित करने में लगे महसूस होते है कि उनसे बढ़कर ईमानदार व चरित्रवान कोई नहीं और उनका विरोध करने वाले से बड़ा बईमान व चरित्रहीन कोई नहीं। वह शायद ये नहीं समझते है कि हम एक अंगूली किसी की ओर उठाते है तो चार हमारी तरफ होती है। हमारे नेता अपनी जुबान पर नियंत्रण रखने को प्राथमिकता देने की बजाय ध्यान नहीं रहा गलती से ऐसा हो गया बोल मामला सुलटाने में अधिक भरोसा रखते है। गलती हो गई बोल मान जाता है कि विरोध करने वाले उनकी बदजुबानी को भूल जाए। दुनिया भर का ज्ञान रखने का दावा करने वाले हमारे इन ‘माननीयों’ को इतनी सी बात क्यों समझ में नहीं आती है कि जुबान से निकले शब्द ओर कमान से निकला तीर कभी बिना असर किए वापस नहीं लौट सकते है। दोनों के घाव बहुत गहरे होते है। ये जुबान ही है जो कभी ‘महाभारत के संग्राम’ का कारण बन जाती है तो कभी दो देशों को युद्ध की आग में झोंक लाखों जिंदगियों को दांव पर लगा देती है। समय आ गया है कि दलगत राजनीति से उपर उठ अब जुबान फिसलने के नाम पर देश का माहौल खराब करने वाले नेता हो या अन्य कोई ओर उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित हो ओर माफी स्वीकार करने से पहले उसके पीछे के मकसद को अवश्य देखा जाए। जान-बुझकर बदजुबानी की गई हो तो सख्त से सख्त कार्रवाई में कोई संकोच नहीं होना चाहिए ओर कार्रवाई इतनी कड़ी होनी चाहिए कि अगली बार कोई भी उलटा-सीधा बोलने से पहले सौ बार सोचने को मजबूर हो जाए। सरकार व न्याय व्यवस्था के स्तर पर बिना ठोस व सख्त कार्रवाई के हालात सुधरने की उम्मीद नहीं की जा सकती।