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क्या उसे ठीक समय पर पर्याप्त चिकित्सा सुविधा मिल पायेगी

क्या उसे ठीक समय पर पर्याप्त चिकित्सा सुविधा मिल पायेगी

कोरोना संकट की चौथी लहर की सुगबुगाहट के बीच आम आदमी की असली चिंता यह है कि यदि वाकई लहर आती है तो क्या उसे ठीक समय पर पर्याप्त चिकित्सा सुविधा मिल पायेगी। कोरोना संकट ने हमारे चिकित्सा तंत्र की नाकामी को उजागर किया है। उन निजी अस्पतालों के संचालकों व लोगों के चेहरों का नकाब हटाया है जिन्होंने कोरोना मरीजों को उलटे उस्तरे से मूंडा है, जिन्होंने आपदा में अवसर तलाशा है। देश वह समय नहीं भूलेगा जब लोग आक्सीजन सिलेंडरों के लिये मारे-मारे फिर रहे थे। फिर तंत्र कहता है कि आक्सीजन की कमी से किसी की मौत नहीं हुई। सवाल यह भी है कि अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में यह सवाल एक बार फिर से क्यों उठ रहा है कि कोरोना काल की मौतों का वास्तविक आंकड़ा सरकारी आंकड़ों से कई गुना ज्यादा है। बहरहाल, कोरोना महामारी अकेली महामारी नहीं है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि क्या वास्तव में यह महामारी थी या किसी साम्राज्यवादी सत्ता का जैविक हथियार। हाल ही में कई देशों में जैविक हथियारों के कार्यक्रमों की खबरें प्रकाश में आई हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम किसी ऐसी नई आपदा के लिये तैयार हैं? भारत में गरीबी के चलते बड़ा वर्ग सरकारी अस्पतालों पर आश्रित है। हमारी सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं किस हाल में हैं, यह तथ्य सार्वजनिक है। चिकित्सा का बुनियादी ढांचा ही चरमराया हुआ है, जिसमें न केवल चिकित्सकों की कमी है, बल्कि पर्याप्त चिकित्साकर्मी भी नहीं हैं। यह विडंबना ही कही जायेगी कि जब हम देश में आजादी का अमृत महोत्सव मनाने जा रहे हैं तो हर आदमी को पर्याप्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने में सक्षम नहीं हैं। निस्संदेह, समुचित चिकित्सा सुविधा प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, जिसमें अब तक की सरकारें विफल ही नजर आयी हैं। दरअसल, इस देश की सरकारों की प्राथमिकता में बेहतर स्वास्थ्य तंत्र कभी रहा ही नहीं है। विडंबना यह है कि हर चुनाव में स्वास्थ्य जैसा गंभीर मसला चुनावी एजेंडे से गायब ही रहा।

बहरहाल, पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने देश को भरोसा दिलाया कि अगले दस सालों में बड़ी संख्या में चिकित्सक मिलेंगे। साथ ही कहा जा रहा है कि देश के हर जिले में एक मेडिकल कालेज खुलेगा। निस्संदेह, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के नजरिये से यह महत्वपूर्ण कदम है लेकिन सवाल यह है कि यदि हर जिले में मेडिकल कालेज खुलेगा तो क्या वे तमाम चिकित्सा सुविधाओं व योग्य शिक्षकों से लैस होंगे कि देश को कुशल डॉक्टर मिल पायें? निस्संदेह, देश में डाक्टरों का बड़ा अभाव है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के हिसाब से जहां देश में एक हजार लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए, वहीं भारत में यह संख्या डेढ़ हजार है। बहरहाल, यदि सरकार की तरफ से ईमानदार कोशिश होती है तो किसी हद तक आने वाले दशक में इस समस्या से निजात पायी जा सकती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश की जनसंख्या में लगातार वृद्धि हो रही है और उसी के अनुरूप हमें अपनी चिकित्सा तैयारी करनी चाहिए। निस्संदेह, चिकित्सा ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन करना होगा। विडंबना यह भी है कि आज भी देश की जीडीपी का तीन प्रतिशत से भी कम स्वास्थ्य के क्षेत्र पर खर्च किया जा रहा है। ऐसे में इतने बड़े देश की स्वास्थ्य जरूरतों की पूर्ति के लिये सेहत का बजट बढ़ाना अपरिहार्य है। एक बात तो तय है कि देश के आर्थिक संसाधन सीमित हैं। यही वजह है कि केंद्र सरकार ने एलोपैथी के साथ वैकल्पिक चिकित्सा प्रणालियों को प्रोत्साहन देने का सार्थक प्रयास किया है। यह वक्त की जरूरत भी है कि महंगी होती आधुनिक चिकित्सा गरीब आदमी की पहुंच से दूर होती जा रही है। सरकार को आधुनिक चिकित्सा को कारोबार बनाने वाले तत्वों पर भी नकेल कसनी होगी। सरकारों को भी सोचना होगा कि देश की उत्पादकता नागरिकों के स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। उन कारणों की पड़ताल करनी होगी जो लोगों को बीमार बनाते हैं।