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भीड़ जुटाओ, पैसा कमाओ का नुस्खा

भीड़ जुटाओ, पैसा कमाओ का नुस्खा

रतन चंद ‘रत्नेश’

बहुत दिनों बाद कल मुरारी लाल का फोन आया। बचपन का मित्र था, आगे चलकर तुम कहां और हम कहां हो गए थे। वर्षों बाद फेसबुक हुए और फिर फेस-टु-फेस। पड़ोस के राज्य में ही रहता है। अपुन तो सरकारी सेवा से मुक्त होकर सभी सेवाओं से मुक्त हो गए परंतु वह अब भी तन-मन-धन से देश की सेवा में जुटा हुआ है। इसी बाबत सलाह देने लगा- ‘एक ऐसा काम बताता हूं, जिसमें न पूंजी लगे, न श्रम। बस कुछ दिहाड़ीदारों, बेरोजगारों और जान-पहचान के लोगों से बातें करनी हैं। हींग लगे न फिटकरी, रंग भी आए चोखा।’ उसकी इस कहावत पर मैं समझ गया कि पट्ठा कुछ पढ़-लिख गया है। विश्वास हुआ, पूछा कि काम बता। कहने लगा, आजकल राजनीतिक रैलियों में भीड़ जुटाने का धंधा बड़े जोर-शोर से चल पड़ा है। मुझे तो इस धंधे में आए तीन ही साल हुए हैं पर कमाई इतनी कि पूछो मत। करना कुछ भी नहीं है। बस एक डायरी और पेन लेकर उन लोगों के नाम और मोबाइल नंबर इकट्ठे करने हैं जो कुछ पैसे लेकर भीड़ का हिस्सा बन सकें। अब यह तुम पर है कि तुम कितना उनको देते हो और कितना अपने पास रखते हो। ईमानदारी का काम है- भीड़ जुटाओ, पैसे कमाओ। मुझे तो अच्छा-खासा अनुभव हो चुका है, तुम्हारी पूरी मदद कर दिया करूंगा। सारा दिन बेकार बैठने से अच्छा है कुछ कमा ले। घरवालों की नज़र में भी इज्जत बढ़ जाएगी। तेरी उस पेंशन से कुछ नहीं होने-जाने वाला है, समझे।’

मेरा दिमाग ठनका, ‘अबे तू इस लाइन में पहले से ही है तो मेरी क्या जरूरत?’ कहने लगा, ‘तू ठीक कहता है। अब मुझे भीड़ जुटाने में कोई दिक्कत नहीं होती परंतु डिमांड बढ़ गई है और सप्लाई बहुत कम है। पिछले दिनों हमारे इलाके में एक नेता की रैली थी। भीड़ जुटाने के लिए पहले एक ही फोन आया करता था परंतु इस बार उसी पार्टी के दस लोगों के फोन आए। सब अपने लिए भीड़ जुटाना चाहते थे और आलाकमान की नज़रों में सर्वाधिक भीड़ जुटाने वालों की सूची में शामिल होना चाहते थे। मैं भी क्या करता? मेरे पास पचास हजार लोग थे, बराबर बांट दिए। वे संतुष्ट नहीं हुए और पड़ोस के राज्य से लोगों को लाने के लिए कहा। भला इतने शॉर्ट नोटिस में कहां हो पाता? सो अब मैं आसपास के राज्यों के हर शहर, हर कस्बे में भीड़ जुटाने की फ्रेंचाइजी दे रहा हूं। मेरी सूची में तेरा नाम सबसे ऊपर था।’

फोन पर मैंने उसे टरकाना उचित समझा। ‘भाई शाम को बेटा-बहू ऑफिस से लौटेंगे, उनसे पूछकर ही तुम्हें बता पाऊंगा।’ शाम को इंजीनियर बेटे से बात हुई तो वह उछल पड़ा। ‘पापा, लपक लो। यही काम आगे चलने वाला है। इंजीनियरिंग-डाक्टरी में कुछ नहीं रखा। एक बार काम जम गया तो मैं भी नौकरी छोड़कर इसमें फुलटाइम दूंगा।’ मैंने उसे झिड़का, ‘दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा। महीनों बाद रैलियां होती हैं...’ उसने मेरी बात बीच में ही काट दी, ‘पापा, अब वो दिन नहीं रहे। भीड़ अब सिर्फ रैलियों में ही नहीं, जगह-जगह जुटती है और कई मौकों पर। अब इसी का भविष्य है। एक बार धंधा जम गया तो समझो रोज का ठेका कहीं नहीं गया। दूर की सोचो पापा, दूर की सोचो।’

मैं सोच में पड़ गया- ‘सुना था भीड़ का सिर होता है, दिमाग नहीं