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हम स्वयं को ही संकट में डालते हैं

हम स्वयं को ही संकट में डालते हैं

यह वाकई उलझन भरी बात है कि कोरोना की भीषण त्रासदी झेलने के बाद भी लोग इसकी गंभीरता को समझने से पूरी तरह से इंकार कर रहे हैं। बात चाहे बाजारों की हो या बसों की या अन्य जगहों की, ज्यादातर में देखने को यह आता है कि अधिकांश लोग मास्क पहनने तथा उचित दूरी बनाए रखने के बुनियादी दिशा निर्देशों की अवहेलना करने में अपनी श्रेष्ठता समझ रहे हैं।

लोग बस अड्डों पर यात्री कोविड नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं। अधिकतर के मास्क गले में झूलते मिलते हैं। कई यात्री मास्क पहनते ही नहीं हैं। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन भी कम ही नजर आता है और इन बसों के ड्राइवर कंडक्टर भी कोविड नियमों की अनदेखी करते हैं। इन हालात को लेकर अधिकारी भी बेपरवाह हैं और कोई रोक-टोक नहीं है। बाजारों में भी यही हालात नजर आते हैं जहां लोग बिना किसी तैयारी के जाते हैं और आम दिनों की तरह व्यवहार करते हैं। नतीजा यह होता है कि उनकी देखादेखी अन्य लोग भी बेपरवाह हो जाते हैं और सब कुछ पहले की तरह ही चलने लगता है। यह बहुत खतरनाक प्रवृत्ति है जिसे पूर तरह से खत्म करना जरूरी है।

यह बात ध्यान में रखी चाहिए कि लॉकडाउन से इसी प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने में सफलता मिली है और इसके परिणाम भी सामने आ रहे हैं। ऐसे में दिशा निर्देशों का उल्लंघन तो स्वयं को खतरे में डालने जैसा ही है। पहली बात तो यही है कि घर से बाहर निकलना जब बहुत जरूरी हो, तभी निकलना चाहिए। यदि बाहर जाने की जरूरत है तो नियमों का पालन करना चाहिए। नियमों का पालन नहीं करके एक तरह से हम स्वयं को ही संकट में डालते हैं। इसलिए जरूरी है कि दिशा निर्देशों का पूरी तरह से पालन किया जाय।