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काट जरूरी है बेशर्म रंग की

काट जरूरी है बेशर्म रंग की

इश्क को कमीना हुए तो जमाना हो गया जी, पर रंग अब जाकर बेशर्म हो हुआ है। इश्क के कमीना होने के बाद अब कोई प्रेमिका यह नहीं कहती कि उसकी चुनरी से प्रेम का रंग नहीं उतरना चाहिए, चाहे धोबनिया धोए सारी उमरिया। पर इश्क कमीना होने से कोई परेशानी नहीं थी, लेकिन रंग के बेशर्म होने से बड़ी नाराजगी है। एक जमाना था जब लोग शर्म से लाल हो जाते थे। गुस्से से लाल पीले हो जाते थे। डर से रंग पीला पड़ जाता था, खौफ से चेहरा सफेद पड़ जाता है, अपमान से काला पड़ जाता था और खुशी में गुलाब-सा खिल जाता था। पर बेशर्मी का रंग कैसा होता है, यह किसी ने नहीं बताया।

हां, अलबत्ता यह जरूर सुना है कि रंग ढीठ और जिद्दी भी होते हैं। बल्कि होली के वक्त तो देखा भी है जब कमीने दोस्त पेंटवाला रंग पोत देते हैं। खैर वाशिंग पाउडर वालों ने अपने विज्ञापनों के जरिए हमें बताया कि किचन वगैरह के रंग या दाग भी बड़े ढीठ और जिद्दी होते हैं। बेशर्म रंग के बारे में तो नहीं लेकिन उन्होंने यह जरूर बताया कि दाग अच्छे हैं। फिर भी दाग हटाने हैं तो हमारा पाउडर इस्तेमाल करो। लेकिन जनाब रंग बेशर्म हो जाए तो उसका क्या किया जाए?

देखिए जीवन रंगों के बिना अधूरा है, फीका है, प्रकृति रंगों के बिना अधूरी है, जीवन की भावनाएं तक रंगों के बिना अधूरी हैं। और तो और राजनीति भी रंगों के बिना अधूरी है। देखिए किस तरह से सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपने-अपने रंग चुन लिए हैं। वामपंथियों का लाल है, अकालियों का नीला है, दलित पार्टियों का नीला है। आम आदमी पार्टी ने बसंती अपना लिया है- मेरा रंग दे बसंती चोलावाला। भाजपा का भगवे पर दावा है और आरएसएस का झंडा तो है ही भगवे रंग का। रंगों के बिना तो देशों के झंडे तक नहीं बनते, जो उनकी पहचान होती है। हमारे यहां संन्यास का रंग भगवा है, शांति का रंग सफेद है- इसीलिए तो सफेद कबूतर उड़ाए जाते हैं, क्रांति का रंग लाल है- इसीलिए तो लाल सलाम है, प्रगति का रंग हरा है।

हमारे कवियों, शायरों, गीतकारों ने रंगों का क्या-क्या वर्णन किया है, बखान किया है। रंगों से सौंदर्य का वर्णन किया, उपमाएं दी, अलंकार सजाए। बल्कि एक फिल्मी गीतकार ने तो रंगों से ही देशभक्ति का भी जबर्दस्त वर्णन कर डाला था, जब उन्होंने कहा कि रंग हरा हरिसिंह नलवे से, रंग लाल है लाल बहादुर से, रंग बना बसंती भगतसिंह, रंग अमन का वीर जवाहर से। लेकिन बेशर्म रंग हमने न कभी देखा, न सुना बताओ उसका क्या करें। इसका जवाब आया है, बायकाट करो। लेकिन बेशर्म रंग की काट होनी चाहिए, बायकाट क्यों? ढीठ और जिद्दी रंग की भी तो काट ही होती है। बायकाट थोड़ें।