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हर दिन को आख़िरी मानकर ‘बड़ा काम’ करें, स्टीव जॉब्स हो जाएं!

 हर दिन को आख़िरी मानकर ‘बड़ा काम’ करें, स्टीव जॉब्स हो जाएं!

जनाब, स्टीव जॉब्स की ज़िंदगी से जुड़ी नज़ीरों का सिलसिला चुनिंदा लफ़्ज़ों में समेटना मुमकिन न हुआ. होता भी कैसे? ख़ुद पढ़कर देखते और समझते जाइए…

चौथी मिसाल है, साल 1973-74 की. कैलीग्राफी का कोर्स बहुत लंबा नहीं है. जल्द ख़त्म हो जाता है. अब जॉब्स को कुछ सूझ नहीं रहा है कि आगे क्या और कैसे करना है. मन बेचैन है. इसी बीच, ‘हरे कृष्ण मंदिर’ के संपर्क में भी आ चुके हैं. अपने शहर से सात मील दूर पैदल चलकर हर इतवार को इस मंदिर में जाया करते हैं. यहां कम से कम उस दिन एक वक़्त भरपेट भोजन मिल जाया करता है. साथ में मन को सुकून भी. शायद, यहीं से उन्हें हिन्दुस्तान के आध्यात्म की गहराई का कुछ भान हुआ है. लिहाज़ा, पूरी तरह से यह तज़रबा करने के लिए वे हिन्दुस्तान रवाना हो जाते हैं. इधर-उधर काम करने के बाद कुछ पैसे जुटाकर वे हिन्दुस्तान आ गए हैं. उत्तराखंड की पहाड़ियों में प्रकृति को आत्मसात् कर रहे हैं. बाबाओं, महात्माओं के साथ साधना कर रहे हैं. जीवन का मक़सद समझने की कोशिश में हैं. उसके आदि, मध्य और अंत की गुत्थी सुलझा रहे हैं.

 

 

पांचवीं मिसाल. साल 1974-75. हिन्दुस्तान से मूल-मंत्र सीखकर अमेरिका लौटे हैं कि ‘अंतरात्मा की आवाज़ जिस तरफ़ ले जाए बस, उसी ओर चलते जाना है’. यानी दिशा मिल गई है. फ़ैसला भी कर लिया है कि दिल-ओ-दिमाग़ जिस कंप्यूटर-तकनीक की दुनिया में रमता है, उसी में भविष्य तलाशना, बनाना है. लिहाज़ा, ‘एचपी’ में काम के ज़माने में जिन स्टीव वज़नैक से दोस्ती हुई, उन्हें फिर अपना हमराह बना लिया है. पिताजी के गैराज में दोनों ने मिलकर काम शुरू कर दिया है. कुछ अलहदा क़िस्म का कंप्यूटर बनाने का काम. ऐसा, जिसे लोग निजी तौर पर इस्तेमाल कर सकें. क्योंकि अब तक इस क़िस्म के कंप्यूटर बाज़ार में मौज़ूद नहीं हैं. बिजनेस मशीनें ही हैं. जॉब्स ने होमब्र्यू कंप्यूटर क्लब से कुछ मदद ली है. अपनी कुछ निजी चीज़ें बेचकर पैसे जुटा लिए हैं. यही कोई 1,350 डॉलर. यानी हिन्दुस्तानी रुपए में 1.07 लाख के क़रीब. काम शुरू हो गया है.