मेवाड़ की योग को अपूर्व देन-डॉ. जुगनू

उदयपुर, । मेवाड़ योगियों की धरती रहा है और यहां अष्टांग योग ही नहीं, हठयोग, मुद्रायोग आदि के साधक भी रहे हैं। हर अध्याय में योग की प्रतिष्ठा करने वाले गीता जैसे ग्रंथ की यदि यहां मेवाड़ी में टीका हुई तो चित्रांकन भी हुआ। इसी प्रकार गुरु गुमान सिंह और बावजी चतुर सिंह ने गीता और योग दर्शन की टीका ही नहीं, योग साधना कर मेवाड़ को तपोभूमि सिद्ध किया।
यहां गांव गांव सिद्धों, पाशुपत यतियों और नाथों का विचरण रहा जो योगी थे और उनके नाम टकरावट (झाड़ोल) से लेकर बिजोलिया तक के शिव मंदिरों पर अंकित मिलते हैं। अनेक धूनियों के आयस और साधकों को महाराणा प्रताप, अमरसिंह, जगतसिंह आदि ने भूमदान कर ताम्रपत्र दिए। मचिंद की धूनी, भमराज, विखरनी, विजोली, कनेरा धारेसर, रनिया छापर, भरख मगरा, खामली घाट, गोरख्या, आंजनिया जैसे साधना स्थल प्रसिद्ध हैं। यह बात साहित्यकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू ने भोइयो की पचौली में योग दिवस पर आयोजित एक योगाभ्यास शिविर में कही।
उन्होंने कहा कि छः अंगों वाला योग जो वायु पुराण में वर्णित है, एकलिंग पुराण उसी पुराण से सम्बद्ध रहा जिसमें योग और योगियों की चर्चा है। प्रेक्षाध्यान जैसा नवीन योग मेवाड़ से चला तो गोगुंदा के मोडी गांव के महाराज के प्रशिष्य संत रामदेव ने योग को वर्तमान में लोकप्रियता दी।
शिक्षाविद् देशपाल सिंह शेखावत ने मेवाड़ की राजयोग परंपरा के अध्ययन को प्रोत्साहन देने पर जोर दिया। योग प्रशिक्षक हरिसिंग राजावत, कमलेश शर्मा, उपेंद्र सिंह अधिकारी, सतीश मोड़ आदि ने भी विचार रखे। संचालन तरुण कुमार शर्मा ने किया।
