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चुनाव की लहरें जब चलने लगे..

चुनाव की लहरें जब चलने लगे..

इधर ठीक-ठाक शीतलहर है, होनी भी चाहिए.. सर्दी में भी कंपकंपी ना छूटे तो क्या मतलब... क्या मजा इस मौसम का। 
ऐसे ही फिर गर्मी में  फिर "लू की लहरें, तब भी बच के रहना पड़ता है।

बहरहाल "लहर" शब्द ही लपेटे में लेने वाला लगता है, कोविड भी तो लहरों पर ही सवार होकर आया था...

लेकिन "चुनावी लहर"  की बात अलग है। इस लहर में तो नेताऔ के साथ साथ जनता भी झूमती है।
 
चुनाव की लहरें जब चलने लगे.. फिर तो क्या सर्दी, क्या गर्मी... कोविड जैैसी लहरें तक साईड में हो जाती है। 

चुनाव इस देश सर्वश्रेष्ठ, सर्वप्रिय उत्सव है। ये इम्युनिटी बढ़ाता है। साधारण सा कोई कमजोर, बीमार आदमी भी इस उत्सव में उछल उछल कर गरबा खेल सकता है। 

घर परिवार और अपने बच्चों से कभी दो घंटे भी बात ना करने वाला आदमी,  चुनाव की चर्चा पर दो दिन तक बोल सकता है।

ये लहर अगले साल आ रही है लेकिन इम्युनिटी अभी से बढ़ने लगी है। कहीं चार आदमियों के बीच बोल दिजिए की फलां जगह से इनको टिकट मिल रहा है, तो तुरन्त चालीस जिज्ञासु, पिपासु लोग आपको घेर लेगें।... बताईये..बताईये .. किसको कहां से मिल रहा है....। 

इस पर कभी चर्चा नहीं होगी कि पिछली बार जिनको मिला... उन्हौने क्या किया... इस बात में कोई रस नहीं है।

खैैर ये चुनाव की लहर भी सिर्फ चुनाव के नतीजों तक ही प्रभावी रहती है। उसके बाद घर परिवार, काम धन्धे की वैक्सीन इस वायरस को खत्म कर देती है। 

वैैक्सीनेेशन के बाद आम आदमी चुप्पी साध लेता है और खास नेता अपना लक्ष्य साधने लगते है। 

और हां, जिन लोगों पर ये चुनावी लहरे असर नही करती, उनके बोलने की ताकत बनी रहती है... वे बोलते रहते है ...  कि सड़को पर गढ्ढे है, नालियां जाम है...  अतिक्रमण, भ्रष्टाचार बढ़ रहा है ... नये पुल में छेद है । वगैरहा- वगैरहा

ये सिर्फ हल्ला है.. बेमतलब का.. रस तो बातों में है... टिकट की बातों में। 
(kgkadam)