गो-संरक्षण के नाम पर ₹5201 करोड़ की भारी वसूली, फिर भी सड़कों पर भटक रहा गोवंश; ₹1300 करोड़ के अंतर ने खड़े किए सवाल
जयपुर। राजस्थान में गो-संरक्षण के नाम पर आम जनता की जेब से अधिभार (सरचार्ज) के रूप में करोड़ों रुपये वसूले जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर गायों की स्थिति जस की तस बनी हुई है। विधायक हंसराज पटेल द्वारा विधानसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में जो आंकड़े सामने आए हैं, वे सरकारी दावों की पोल खोल रहे हैं। पिछले चार सालों में गो-संरक्षण के नाम पर **₹5201.93 करोड़** का भारी-भरकम राजस्व वसूला गया, लेकिन पंजीकृत गोशालाओं को केवल **₹3996.83 करोड़** का ही अनुदान जारी हुआ। करीब **₹1305 करोड़** की राशि का यह भारी अंतर अब जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।
आंकड़ों का 'कड़वा' सच: वसूली पूरी, राहत आधी-अधूरी
सरकार ने जनवरी 2022 से दिसंबर 2025 तक स्टाम्प ड्यूटी पर 10% और शराब पर 20% अधिभार वसूला। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि शुरुआती दो वर्षों (2022 और 2023) में राजस्व की तुलना में अनुदान की राशि बेहद कम रही। हालांकि 2024 और 2025 में अनुदान में वृद्धि हुई, लेकिन कुल अंतर अभी भी ₹1300 करोड़ से अधिक है। पशुपालन विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस अतिरिक्त राशि का सही उपयोग होता, तो हर जिले में आधुनिक गो-अभयारण्य और चारा बैंक बनाए जा सकते थे।
सड़कों पर भटकता गोवंश: किसानों और राहगीरों पर दोहरी मार
करोड़ों की वसूली के बावजूद शहरों और गांवों की सड़कों पर लावारिस गोवंश खुलेआम घूम रहा है। नागौर सहित प्रदेश के कई जिलों में यह न केवल सड़क दुर्घटनाओं का मुख्य कारण बन रहा है, बल्कि किसानों की लहलहाती फसलों को भी भारी नुकसान पहुंचा रहा है। ग्रामीणों को रात-भर खेतों की रखवाली करनी पड़ रही है और तारबंदी का अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ रहा है। विडंबना यह है कि अप्रैल 2025 के बाद से प्रदेश की अधिकांश गोशालाओं को अनुदान तक जारी नहीं किया गया है।
नंदी गोशाला योजना की विफलता: घोषणाएं हवा-हवाई
पिछली सरकार ने प्रत्येक पंचायत समिति स्तर पर नंदी गोशाला खोलने का वादा किया था, लेकिन हकीकत यह है कि प्रदेश की सैकड़ों पंचायत समितियों में से अब तक केवल **70 नंदीशालाएं** ही स्थापित हो पाई हैं। इन पर मात्र ₹70.02 करोड़ आवंटित किए गए, जो विशाल बजट के मुकाबले ऊँट के मुँह में जीरा समान है।
जवाबदेही का बड़ा सवाल
प्रदेश में वर्तमान में **4,425 गो-संस्थाएं** पंजीकृत हैं, जिनमें लगभग **14.33 लाख** गोवंश का संधारण किया जा रहा है। सबसे अधिक गोवंश जोधपुर संभाग में संरक्षित है, जबकि भरतपुर संभाग इस मामले में सबसे पीछे है। जनता पूछ रही है कि जब फंड की कोई कमी नहीं है, तो फिर सड़कों पर गोवंश लावारिस क्यों है और गोशालाएं अनुदान के लिए क्यों तरस रही हैं?
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