नेशनल ट्र्राईबल भित्ति चित्र एवं माण्डना कला कार्यशाला का शुभारंभ

Update: 2026-03-13 12:00 GMT

 

उदयपुर,  । जनजाति क्षेत्रीय विकास मंत्री  बाबूलाल खराड़ी ने कहा कि पारंपरिक कलाएं और लोक परंपराएं ही हमारी संस्कृति की वास्तविक पहचान हैं। आज बदलते समय और आधुनिकता के प्रभाव के कारण संस्कृति के सामने कई तरह की चुनौतियां खड़ी हो रही हैं, जिससे पारंपरिक कलाएं धीरे-धीरे लुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है। उन्होंने कहा कि कलाएं रहेंगी तभी संस्कृति जीवित रहेगी। इसलिए इन कलाओं का संरक्षण और संवर्धन करना अत्यंत आवश्यक है।

 खराड़ी शुक्रवार को सांस्कृतिक स्त्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र (सीसीआरटी) सभागार में जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग तथा माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान के तत्वावधान में आयोजित पांच दिवसीय नेशनल ट्राईबल भित्ति चित्र एवं माण्डना कला कार्यशाला के शुभारंभ समारोह को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे।   खराड़ी ने देश भर से आए जनजाति कलाकारों का स्वागत किया। उन्होंने भित्ति चित्र, मांडना और जनजातीय कला जैसी परंपराएं केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता और जीवन मूल्यों की धरोहर हैं। मंत्री ने कहा कि सरकार और समाज दोनों को मिलकर ऐसे प्रयास करने होंगे, जिससे कलाकारों को प्रोत्साहन मिले और आने वाली पीढ़ियां भी अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी रह सकें। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ऐसे हालात बन रहे हैं, जिससे संस्कार और संस्कृति का क्षरण हो रहा है। इस तरह की कार्यशालाएं इन कलाओं को पुनर्जीवित करने और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का सशक्त माध्यम सिद्ध हो सकती हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सीसीआरटी अध्यक्ष विनोदनारायण इंदूकर ने कार्यशाला को जनजाति संस्कृति और कलाओं के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया। सीसीआरटी की भावी कार्ययोजनाओं की जानकारी देते हुए राज्य सरकार के साथ मिलकर जनजाति कलाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए विविध गतिविधियां आयोजित किए जाने का भी प्रस्ताव रखा। विशिष्ट अतिथि मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के दृश्य कला विभाग निदेशक हेमन्त द्विवेदी ने भी विचार व्यक्त किए।

प्रारंभ में टीआरआई निदेशक ओपी जैन ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यशाला के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कार्यशाला के माध्यम से देश में जनजातीय विरासत, जनजाति कलारूपों और मौखिक परम्पराओं सहित विभिन्न जनजातीय भित्ति चित्र एवं माण्डना कला के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और संवर्धन का प्रयास किया जा रहा है। कार्यशाला में राजस्थान सहित केरल, बिहार, त्रिपुरा, ओड़िशा, महाराष्ट्र, गोवा सहित अन्य राज्यों से जनजाति कलाकार भाग ले रहे हैं। पांच दिवसीय इस कार्यशाला में यह कलाकार अपने राज्यों के भित्ति चित्र एवं माण्डना कला शैलियों के अनुभव साझा करेंगे। भित्ति चित्र आदिवासियों के प्रकृति के जुड़ाव एवं दैनिक जीवन की गतिविधियों का दिग्दर्शन है। वहीं माण्डना कला के द्वारा आदिवासी अपने त्यौहारों व विशिष्ट आयोजनों के अवसर पर घर के आंगन इत्यादि में विशिष्ट कलाकृतियां बनाते हैं।

कार्यक्रम में जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग के अतिरिक्त आयुक्त कृष्णपालसिंह चौहान भी बतौर विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे। आभार कार्यशाला के नोडल प्रभारी तथा निदेशक सांख्यिकी सुधीर दवे ने व्यक्त किया। इस अवसर पर टीएडी के सहायक निदेशक, दिनेश उपाध्याय सहित कलाकार उपस्थित रहे। संचालन व्याख्याता हर्षवदन सिंह सोलंकी ने किया।

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