नेशनल ट्र्राईबल भित्ति चित्र एवं माण्डना कला‘‘ कार्यशाला 13 से

Update: 2026-03-10 16:20 GMT


 उदयपुर, । देश में जनजातीय विरासत, जनजाति कलारूपों और मौखिक परम्पराओं सहित विभिन्न जनजातीय भित्ति चित्र एवं माण्डना कला के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और संवर्धन के लिये माणिक्य लाल वर्मा आदिम जाति शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान (टीआरआई), उदयपुर द्वारा जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से स्पोर्ट टू टीआरआई कार्यक्रम के तहत ‘‘नेशनल ट्राइबल भित्ति चित्र एवं माण्डना कला‘‘ की कार्यशाला 13 से 17 मार्च, 202़6 तक सांस्कृतिक स्त्रोत एवं प्रशिक्षण केन्द्र (सीसीआरटी), उदयपुर में किया जा रहा है।

टीआरआई निदेशक ओपी जैन ने बताया कि इस राष्ट्रीय कार्यशाला में राजस्थान सहित देश के विभिन्न राज्यों के टीआरआई केंद्रों से दक्ष कलाकार हिस्सा लेंगे, जिसमें महाराष्ट्र्र एवं गुजरात से 5 वार्ली चित्रकार, गोवा से माण्डना, बिहार से 4 संथाली चित्रकार, सिक्किम से 2 थान्का, उड़िसा से 1 गोण्ड एवं 1 सौरा चित्रकार, मेघालय एवं केरल से 8 भित्ति चित्रकार, कर्नाटक से 2, त्रिपुरा से 4 जनजाति चित्रकार तथा राजस्थान से विभिन्न जिलों से 25 भित्ति चित्रकारों कुल 50 से अधिक राष्ट्रीय स्तर के जनजाति कलाकारों की भागीदारी रहेगी। राजस्थान के साथ-साथ अन्य प्रमुख जनजातीय बहुल राज्यों के कलाकार अपनी क्षेत्रीय कला शैलियों का प्रदर्शन करेंगे, तथा अपने-अपने क्षेत्र की जनजाति कला, वैचारिक तथा रचनात्मकता का आदान-प्रदान करेंगे। कार्यशाला का उद्घाटन 13 मार्च 2026 को प्रातः 11.30 बजे जनजाति मंत्री बाबूलाल खराडी करेगे तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता जनजाति क्षैत्रिय विकास विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव कुंजीलाल मीणा द्वारा की जाएगी। जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग के आयुक्त कन्हैया लाल स्वामी एवं प्रोफेसर मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय हेमन्त द्विवेदी स्पेशल गेस्ट के रूप में उपस्थित रहेंगे।

श्री जैन ने बताया कि आदिवासी भित्ति चित्र (वाल पेंटिंग) और माण्डणा आदिवासी समुदायों की प्राचीनतम कला अभिव्यक्तियाँ हैं। माण्डणा, जो मुख्य रूप से देश की जनजातियों द्वारा घरों के आंगन और दीवारों पर बनाया जाता है, केवल सजावट नहीं बल्कि शुभता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। यह कला आदिवासी समुदायों की अद्वितीय पहचान और उनके पौराणिक इतिहास को संजोए हुए है। आधुनिक चकाचौंध और शहरीकरण के कारण पारंपरिक विधियों (जैसे प्राकृतिक रंगों और मिट्टी का उपयोग) का चलन कम हो रहा है। ये कलाकृतियाँ पर्यावरण के अनुकूल सामग्रियों से बनाई जाती हैं, जो आज के समय में ‘सस्टेनेबल लिविंग’ का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। आम नागरिक इन कलाकृतियों को अपने घरों और कार्यालयों में स्थान देकर, स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहित कर और इन पारंपरिक विधियों को सीखने में रुचि दिखाकर इनके संरक्षण में अमूल्य योगदान दे सकते हैं।

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